Sunday, 14 May 2017
तुम्हारा माँ होना
तुम सच में मां जैसी नहीं थीं, बल्कि तुमने मुझे ही मां बना लिया था.मैं अक्सर गुस्सा हो जाती कि तुमने अब तक खाना क्यों नहीं बनाया और फिर खुद ही घर के सारे काम करने लग जाती.इस तरह मुझे घर के सारे काम करने आ गए।
कितना बुरा लगता था जब कोई पूछता तेरी मां लुल्ली (चीख-चीख कर रोना) क्यों मार रही थी, तू समझाती क्यों नहीं अपनी मां को.इन सब में गांव के औरद-मर्द सभी शामिल होते.मैं शर्म से पानी-पानी हो जाती, गुस्सा भी आता कभी तुम पर- कभी लोगों पर और सबसे ज्यादा पिता पर.लेकिन ये हमारी संस्कृति है जिसमें महिलाओं से हर हाल में चुप रहने की उम्मीद की जाती है पति पर हाथ उठाना पाप समझा जाता है.जबकि पति का तो धर्म होता है पीटना.घर-परिवार बच्चों के नजरिए सो चाहे जो मर्जी रहा हो तुम्हारा प्रतिरोध लेकिन बदले में तुम्हारा हाथ उठाना एक स्त्री के तौर पर बिल्कुल सही था मां.कितनी बार तुम कहतीं तुम्हारे लिए जी रही हूं वरना मर जाती.हम बच्चे कितना बांध देते हैं तुम्हें मुझे इस बात का अफसोस है.
Thursday, 6 April 2017
फ्यूंलड़ि और अंयार कुटा
फाल्गुन के महीने में फ्यूंली के फूल खिलने शुरू हो जाते हैं। गुच्छों के रूप में खिलने वाले ये पीले रंग फूल चैत के महीना आते-आते हर जगह नजर आने लगते हैं। सामान्यत: मुझे पीला रंग बहुत पंसद नहीं है लेकिन इसका पीलापन जिंदगी में खेतों की धूल-मिट्टी की तरह रचा बसा है। संभवत: इसलिए ही कवि वीरेन डंगवाल ने इस फूल के रंग को पीताभा कहा है।

सच कहूं फ्यूंली मेरे लिए महज उस तरह
का फूल नहीं है जैसे कि गुलाब या अन्य फूल। मेरे लिए फ्यूंली का मतलब चैत के महीने
का फ्यूंलड़ि याद आना। फ्यूंली का मतलब मेरे लिए अंयार कुटा होना है सहेलियों के
साथ जंगल में गीत गाना है मिलजुल कर खिचड़ी खाना है।
चैत के महीने के आने का मतलब होता है
कि हमारी जिंदगी का सबसे खुशगवार त्यौहार का आना। चैत महीने के पहले दिन से ही हम
लोग घर-घर की देहरी पर फूल डालना शुरू कर देते हैं और ये सिलसिला महीने की 20 गते
तक चलता है। आखिर के दिन सभी लोग बच्चों को फूल डालने के बदले खिचड़ी बनाने के लिए
चावल- दाल देते हैं।
रात भर बेसब्री में गुजारने के बाद
सुबह का इंतजार शर्त यही कि कि घाम लगने से पहले भीटों से फूल चुनकर ले आएं। फिर
आस-पड़ोस और गांव भर में जहां तक संभव हो घरों की देहरी को फूलों से सजा देते हैं।
औ फ्यूंली से हम महज देहरी को ही नहीं सजा रहे होते हैं बल्कि फ्यूंली को भी सजा
रहे होते हैं खुद को उसमें शामिल कर रहे होते हैं।
फ्यूंली महज फूल नहीं है। बल्कि
फ्यूंली एक प्रेम में सरोबार लड़की की कहानी है। मां अक्सर फ्यूंली की कहानी
सुनाते सुनाते भावुक हो जातीं शायद उनको उस वक्त अपना मायका भी याद आ जाता होगा।
मां कहती बहुत समय पहले की बात है
जंगल में एक लड़की रहा करती थी उसका नाम फ्यूंली था। वो जंगल ही उसके लिए घर था। जंगल
के तमाम पेड़-पौधे, घास पत्तियां, पशु पक्षियांउसकी जिंदगी थी, सांसे थीं। ये सब
उसके लिए मां-पिता, भाई-बहन, सखीसहेलियां थे जिनके साथ वो जिंदगी की धड़कनें
महसूस करती थी।
जब वो कुछ बड़ी हो गई तो उसकी एक
राजकुमार से शादी हो जाती है। शादी के वक्त फ्यूंली बहुत उदास थी वो जान रही थी कि
उसकी जिंदगी से कुछ खत्म हो रहा है। जंगल भी कहां खुश था फ्यूंली के विदा होने से।
विदाई के वक्त पूरा जंगल उसके लिए उदास हो गया।
राजमहल में फ्यूंली को जंगल की बहुत
खुद (याद) लगती थी। अकेले में आंसू बहाती फ्यूंली को राजमहल किसी खबेस की तरह लगता।
राजकुमार ने फ्यूंली के लिए राजमहल में ही वन-उपवन बनाए कि किसी तरह तो उसका मन
लगे, लेकिन जंगल की बेटी को राजमहल कहां रास आता।
फ्यूंली को उसकी इच्छा के अनुसार जंगल में दफना दिया जाता है। लेकिन जंगल की इस बेटी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दफ्न हुई जगह पर से फिर से जी उठती है फूल बनकर। इन्हीं फूलों को फ्यूंली कहा जाने लगा। हर बार कहानी का अंत आते-आते मां की आंखे नम हो चुकी होती। तब मुझे मां में ना जाने क्यों फ्यूंली का अक्स नजर आता तो कभी लगता फ्यूंली मेरी सहेली होती तो कितना अच्छा होता। मां कहती हैं तब से ही सब लोग फ्यूंली को याद करते हैं।
20 गते चैत वो दिन होता जिसका हमें
सबसे अधिक बेसब्री से इंतजार रहता। ये वो दिन होता जब हम सब बच्चे जंगल में जाकर
साथ मिलकर खिचड़ी बनाते। मुझे याद है इसके लिए हमने कभी भी बड़ों की मदद नहीं ती। सब
बच्चे मिलकर चावल-दाल, नमक, मासाला, लकड़ी, बर्तन, पानी, सारी जरूरत की चीजें लेकर
गांव के ऊपर के जंगल की ओर चल पड़ते। मट्ठा और दही तो सबसे खास होते। खिचड़ी का
मतलब ही होता है मट्ठा के साथ मिलाकर खाना।

ऐसा भी नहीं था कि गांव भर के बच्चे
एक साथ खिचड़ी बनाते। लड़कियां अलग समूह में बनातीं तो लड़के अलग समूह में। इसके
अलवा उम्र के हिसाब से भी समूह बन जाते थे, या ऊपरी मंझले या निचले गांव के
मुताबिक भी। इस तरह से कई झुंडो में बनता। लेकिन रहते सब आस-पास ही। हंसी-ठिठोली,
लड़ाई झगड़ा सब होता जाता आपस में लेकिन अंयार कुटा के उल्लास में कहीं भी कमी
होती नहीं दिखती।
उसी जगह पर पत्थरों से चूल्हा बनाते और
उस पर खिचड़ी चढा देते। इसी बीच कई गीत या दुआ (घस्यारियों के गीत) गाते गोल-गोल
घेरे में नाचने भी लगते। खिचड़ी बन जाती तो सब के सब लोग अपनी अपनी थालियां लिए
खिचड़ी पर छपट पड़ते खिचड़ी पर और खिचड़ी निकाल लेने के बाद बैठेने के लिए सबसे
अच्छी जगह चुनने के लिए भी इसी तरह करते।
कोई इस पत्थर पर, कोई उस पत्थर पर, कोई पेड़ की छोटी, कोई ऊंची टहनी पर चढ जाते । जो पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर चढ पाते सब उसकी ऐसे तारीफ करते मानो चांद छू लिया हो।

मैं अपनी सहेलियों में सबसे छोटी थी और पेड़ की सबसे निचली टहनी पर या ऐसी जगह पर बैठ पाती जो सबके हथियाने के बाद बची रहती थी। हालांकि उसके बाद जगह का मसला भी खत्म हो जाता। अंयार कुटा के दिन की यह खिचड़ी साल भर में खाई हुई किसी भी खिचड़ी से ज्यादा स्वादिष्ट लगती। मट्ठा उसके स्वाद को और भी बढा देती है।
कोई इस पत्थर पर, कोई उस पत्थर पर, कोई पेड़ की छोटी, कोई ऊंची टहनी पर चढ जाते । जो पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर चढ पाते सब उसकी ऐसे तारीफ करते मानो चांद छू लिया हो।
मैं अपनी सहेलियों में सबसे छोटी थी और पेड़ की सबसे निचली टहनी पर या ऐसी जगह पर बैठ पाती जो सबके हथियाने के बाद बची रहती थी। हालांकि उसके बाद जगह का मसला भी खत्म हो जाता। अंयार कुटा के दिन की यह खिचड़ी साल भर में खाई हुई किसी भी खिचड़ी से ज्यादा स्वादिष्ट लगती। मट्ठा उसके स्वाद को और भी बढा देती है।
खिचड़ी खाने के बाद हम लोग अंयार के
पेड़ से छोटी-छोटी टहनियां तोड़ लेते। फिर नजदीकी गांव की ओर टहनियां हिलाते हुए
जोर-जोर से चिल्लाते- अंयार कुटा नौघराल वालु का दांत टुटा (अंयार कुटा नौघराल
वालों के दांत टूटें)। वहीं दूसरी ओर से नौघराल गांव के बच्चे भी उसी तरह से
चिल्ल्ताते अंयार कुटा भरपुरियागौं वालु का दांत टुटा।
इसके अलावा इसी को बाघ को संबोधित करते हुए भी कहते जो जिसका कि पहाड़ों में हमेशा खौफ रहता। अंयार कुटा बाघा का बाबा का दांत टुटा।( अंटार कुटा, बाघ के बाबा के दांत टूटें।इस चिल्लाने के क्रम में बस गांवों के नाम बदल जाते बाकी जोश जज्बा वही रहता।
इसके अलावा इसी को बाघ को संबोधित करते हुए भी कहते जो जिसका कि पहाड़ों में हमेशा खौफ रहता। अंयार कुटा बाघा का बाबा का दांत टुटा।( अंटार कुटा, बाघ के बाबा के दांत टूटें।इस चिल्लाने के क्रम में बस गांवों के नाम बदल जाते बाकी जोश जज्बा वही रहता।
अब ये भी बताना जरूरी है कि फ्यूंली
से जुड़े इस त्यौहार को अंयार कुटा क्यों कहा जाता है। अंयार एक ऐसा पेड़ है जिसके
पत्ते हल्के जहरीले होते हैं। मां इसी दिन अंयार के पत्तों को कूटकर खिचड़ी के साथ
मिलाती और गोरुओं (गाय, भैंस, बैल) को खिलाती। ऐसा सिर्फ मेरी मां नहीं करती थी
बल्कि मेरी सहेली मीना, सोनी, प्रतिमा की मां और गांव की अन्य महिलाएं भी करतीं।
पूछने पर मां बताती कि जैसा हमारा
त्यौहार है वैसा ही इनका भी तो है। फिर कहती कि ये बोल नहीं पाते तो क्या हुआ,
अक्ल तो इन्हें हमसे से भी ज्यादा है रे छोरी, देखो कैसे सींग हिला रहे हैं और
खाने के लिए। मां साथ में ही बताती कि छोरी बीस गति हो गई है।
बीस का मतलब विष भी होता है। जब ये बण चरने जाएंगे तो कई प्रकार के घास पत्ते होते हैं जिनको खाने से इनको विष लग सकता है। अंयार में हल्का सा विष होता है इसलिए इनको खिचड़ी के साथ मिलाकर खिलाते हैं, ताकि बण में घास चरते समय अगर विष लगने पर उसका असर कम हो जाता है।
बीस का मतलब विष भी होता है। जब ये बण चरने जाएंगे तो कई प्रकार के घास पत्ते होते हैं जिनको खाने से इनको विष लग सकता है। अंयार में हल्का सा विष होता है इसलिए इनको खिचड़ी के साथ मिलाकर खिलाते हैं, ताकि बण में घास चरते समय अगर विष लगने पर उसका असर कम हो जाता है।

ये तो अंयार कुटा का वो पक्ष है जिसके
जरिए हम लोग पड़ोसी गांव के बच्चों से संवाद करते थे घुलमिल जाते थे। लेकिन अब
ज्यादा अच्छे से समझ आता है ये त्यौहार बच्चों के साथ-साथ महिलाओं का भी होता था
और उनके गोरुओं का भी जिनको वो उतना ही प्रेम करती जितना कि हमको।
जहां एक तरफ हम बच्चे घरों को फूलों
से सजाते हैं, तो वहीं हमारे बड़े-बुजुर्ग हमें दाल चावल देते हैं इस दुनिया को
खूबसूरत बनाने के लिए। वहीं महिलाएं उसी खिचड़ी के साथ अंयार को मिलाकर अपने
गोरुओं को खिलाती हैं।
ये वही मांएं जो अपने इन गोरुओं को
बचाने के लिए दरांती लेकर बाघ का सामना तक करने के लिए तैयार रहती हैं। खुद भले
भूखी रह जाएं लेकिन अपने बच्चों और अपने गोरुओं को भूखा मरने नहीं देती हैं। अगर कोई
छोटे व नए पेड़ को काट ले तो सभी उसे मिलकर कोसती हैं। कि ऐसा करते हुए उसे दया भी
नहीं वह तो बच्चा है।
इसके पीछे की वजह है जीवन के प्रति मेरे
गांव-घर वालों की समझदारी। क्योंकि हम जानते हैं जिंदा रहने के लिए जंगलों की
जरूरत भी है तो साथ ही पशुओं की भी, भीटों में उगने वाले इन फूलों की भी।

सोचती हूं फ्यूंली की यह लोग कथा न
सुनी होती तो हमारे मनों में राजमहल के लिए आकर्षण रहा होता। हमारे दिमाग में किसी
राजकुमार या राजकुमारी बनने की चाहत रहती। हमारे गांव-घर ने हमें वास्तविकता के
करीब रहकर जीना सिखाया सिस कारण मैंने हमेशा फ्यूंली बनना चाहा जो जंगलों से प्रेम
करती है।
पिछले कुछ सालों में मुझे कुछ अंतर
जरूर दिखने को मिला है। जिस तरह से हम लोग इस त्यौहार को मनाते थे। अब कम ही ऐसे
बच्चे हैं जिनको अंयार कुटा का इतनी
बेसब्री से इंतजार रहता है। हां लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, मासूम चेहरों
पर इसकी खुशी झलक ही आती है।
अंयार कुटा को एक बारगी देखने पर भले
ही रोमांटिसिज्म नजर आए लेकिन ऐसा है नहीं। अंयार कुटा प्रकृति के साथ हमारे वास्तविक संबंधों पर आधारित है, जो कठिन परिस्थितियों
में भी जीवन में कोमलता बनाए रखता है और उल्लासपूर्वक जीवन जीने में यकीन बनाए
रखता है।
(नैनीताल समाचार के 1 से 15 मार्च के अंक में प्रकाशित)
Tuesday, 4 April 2017
परिधानों के पीछे छिपी स्त्री मन की जकड़बंदी

स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है- सीमोन द बोउवार का यह कथन वास्तव में सच के बहुत करीब है। स्त्री बनायी जाती है और यह प्रक्रिया दृश्य-अदृश्य रूप से हमेशा चलती रहती है। एक ऐसी प्रक्रिया जो स्वाभाविक सी लगती है। परिधान रोजमर्रा की जरूरतों का एक हिस्सा है। एक ऐसीजरूरत जिसके संबंध में कोई खास स्वस्थ बहस नहीं की जाती है। कपड़ों के आधार पर भी स्त्री पुरुषों को बांटा गया है। जरा सा भी गौर किया जाये तो महिलाओं और पुरुषों के परिधानों का एक स्पष्ट अन्तर देखा जा सकता है।
एक बच्ची जब पैदा होती है तब से लेकर उसे क्या पहनाना शुरू किया जाता है फ्रॉक ना। एक झालर वाली शानदार फ्रॉक। जबकि लड़के के कपड़ों में एक सादा सा परिधान होता है। वो क्या देखती है एक मोहक और चमचमाते परिधान को।और वह उसी तरह की चीजों से जुड़ती चली जाती है। जबकि लड़के के पास कपड़ों के नाम पर चयन की बहुत ज्यादा सुविधाएं भी नहीं होती हैऔर उसे परिधानों के प्रति सजग बनाया भी नहीं जाता है।इधर एक लड़की के व्यवहार में धीरे-धीरे परिधानों के प्रति सजगता बढ़ती जाती है।
परिधान की बनावट में अन्तर किया जाये तो कह सकते हैं कि एक मूलभूत अन्तर यह है कि महिलाओं के कपड़े ढीले ढाले य़ा अधिक चुस्त और फैशनेबुल होते हैं। एक बड़ा अन्तर जो है वो यह है कि महिलाओं के कपड़ों से जेब नदारद रहते हैं। क्या कारण है कि जहां एक पुरुष परिधान में जेबों की भरमार होती है कुर्ते से लेकर पैंट और शर्ट में भी वहीं महिलाओं के परिधान में जेब होती भी है तो किसी कोने पर एक सजावट के लिये। यह मात्र परिधानों या जेब का ना होना नहीं है यह समाज में बैठी उस गहरी मानसिकता का प्रतीक है जिसके तहत महिला को अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी मानने से इनकार किया जाता है। जाहिर है जेब का होना पैसे होने का प्रतीक है। अर्थव्यवस्था से महिलाओं को हमेशा किनारे रखा गया है। हालांकि इधर तस्वीर कुछ बदली है लेकिन तस्वीर पूरी तरह बदली है यह कहना खुद को बेवकूफ बनाना है।
जीन्स में जेब होती हैं जबकि साड़ी या अन्य पारंपरिक परिधानों में जेब नहीं बनायी जाती है यह आम मानसिकता है महिलाएं चलेंगी तो पर्स या बैग लेकर ही चलेंगी। जबकि जेब न होने की परेशानी हर रोज बाहर लिकलने वाली कोई भी महिला समझ सकती है। हालांकि अकसर बड़ी जेब वाली जींस ढूंढने में भी अक्सर लड़कियों को मशक्कत करनी पड़ती है।जेब होने की सुविधा के चलते ही महिलाएं आजकल जीन्स को तरजीह देती हैं।

बौद्धिक स्त्रियों से भी समाज बडी विरोधाभास पूर्ण अपेक्षाएं रखता है । यदि वे अपने परिधान पर पूरा ध्यान नहीं देती तो लोग उन्हें मर्दाना स्वभाव का कहते हैं और यदि फैशन और मेकअप करती हैं तो लोग कहते हैं कि औरत औरत ही रहती है।–सिमोन
उसे कॉलेज/ऑफिस जाना है और वो फिर से अपने कपड़ो के बक्से से ऐसी ड्रेस निकाल रही है जिसे उसने कल पिछले हफ्ते या दो हफ्तों से नहीं पहना है। यह निर्भर करता है उसके पास कपड़े कितने है। दूसरी ओर लड़का दो ही जोड़ी कपड़ों को हफ्ते दो हफ्ते चला लेता है।मैं अपनी मित्रों से पूछा करती हूं कि वे हमेशा अलग अलग परिधान के लिये इतनी चिन्तित क्यों रहती हैं क्योंकि सिर्फ कपड़ों और मेकअप पर इतना पैसा और समय बर्बाद करने का क्या औचित्य है। तो अक्सर का जवाब होता है फलां सहकर्मी हर रोज नए नए कपड़े पहनती है और यदि मैं नहीं पहनूंगी तो लोग कहेंगे कपड़े नहीं है / गरीब है या कंजूस है इत्यादि इत्यादि। यह मानसिकता है क्या दरअसल । यही ना कि स्त्री को अपने सजाये संवारे रखना बहुत जरूरी है।
आमतौर पर पाश्चात्य परिधानों को अश्लील या संस्कृति को भ्रष्ट करने वाला बताया जाता है और बलात्कार का कारण इनको बताया जाता है और लगातार इसके विरोध में बयान या फरमान जारी होते रहते हैं। जबकि गौर करेंगे तो वर्तमान में पाश्चात्य परिधानों का जो रूप है वह वह वहां की महिलाओं ने वक्त के साथ अपनाया है। 19वीं सदी या उसके बाद तक भी वहां के परिधान भी लम्बे चौड़े एवं काफी हद तक असहज होते थे। गॉन विदद विंड फिल्म की नायिका स्कारलेट जब कपड़े पहनती है तो उसकी परिचारिका उसके कपड़े की बेल्ट को अधिक से अधिक कसने की कोशिश करती है। क्योंकि एक महिला को हमेशा दुबला दिखना चाहिये। या फिर ढीले ढाले परिधान हों। सुविधानुसार कम ही होते हैं।
वहीं मुस्लिम समाज की बात करे तो बुर्का पहने हुए महिलाएं बड़े शहरों में भी बड़े आराम से दिख जाती है। हिंदू समाज की महिलाएं भी घूंघट में दिख जाती हैं।मैंने अपनी एक मित्र से इस बारे में बातचीत की तो उसका स्पष्ट कहना था कि घूंघट बड़ो के प्रति सम्मान दिखाने का एक प्रतीक है जो कहीं से भी गलत नहीं है। मुस्लिम मित्र से बुर्के के औचित्य पर सवाल किया तो असका कहना था स्त्रियों के कुछ अंग ऐसे होते हैं जिसके लिये बुर्का जरूरी है। ये एक युवा पीढ़ीं के विचार हैं।
और परिधानों का बदलना काफी हद तक समाज की मानसिकता का बदलना या बदलने की कोशिश करना होता है। पश्चिम की महिलाएं ना सिर्फ कपडों के मामले में खुली सोच की हैं बल्कि अनकी सोच अन्य मामलों में भी उतनी ही खुली होती है। हालांकि यह हमेशा नहीं होता है।

दरअसल चर्चा करने का मूल उद्द्श्य यहां कपड़ों के आकार प्रकार और बनावट नहीं है। बल्कि महिलाओं एवं पुरुषों के परिधान संबंधी आदतों में पैदा हुई भिन्नता की पड़ताल करना है।अन्य कारणों को जिस कारण एक महिला के लिये परिधान असकी जिंदगी कै महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं। और अन्य चीजें कही न कहीं गौण हो जाती है। हालांकि इसमें घर सजाना संवारना, सफाई पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देना और खाना बनाने पर विशेष ध्यान देना भी इसमें शामिल हो सकते है लेकिन फिलहाल इसी पर ही बहस केन्द्रित की जा रही है।लम्बे समय से महिला की मानसिकता को एक हर तरह से खांचे में ढालने का जो काम किया गया, परिधान उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। हालांकि परिधानों की यह जकड़बंदी कहीं टूटती नजर आ रही है तो कहीं मजबूत भी हो रही है।
आज यह काम बाजार कर रहा है। मीडिया के माध्यम से एक अलग ही महिला छवि को परोसा जा रहा है। और परिधानों में आये बदलावों को पहचाना जा सकता है। यह एक जकड़बंदी टूटने के बाद उपजी दूसरी जकड़बंदी का दौर है। और चुनौति यह है कि दोनों ही तरह की जकड़बंदी से आजाद होना है । चाहे वो पारंपरिक हो या बाजार द्वारा पैदा की गयी हो।
Saturday, 1 April 2017
आदिवासी महिलाओं का जीवन संघर्ष और उम्मीद
किसी भी जगह महिलाओं की स्थिति के आधार पर उस जगह के प्रति नजरिया बनता है. रांची मेरे लिए एक नया शहर रहा है. मैंने पहली बार महिलाओं को इतनी बड़ी संख्या में सब्जी बेचते या ठेलों पर काम करते देखा. ऐसा इसलिए भी कि कभी भी आदिवासी क्षेत्रों में नहीं रही हूं. हालांकि अपने गांव और क्षेत्र (उत्तराखंड) में खेतों में या जंगलों में काम करती महिलाओं को देखा है लेकिन औरत का बाजार में बैठना सामान्यत: अच्छा नहीं माना जाता है.
जब भी काम में महिलाओं की भागीदारी की बात होती है तो बड़े-बड़े पदों पर बैठी महिलाओं की छवि दिमाग में कौंधती है. लेकिन छोटे-छोटे और जरूरी कामों में लगी इन अनाम महिलाओं के बारे में शायद ही कभी सोचा जाता है. बाजार में चलते हुए इसी संघर्ष की झलक मिलती है.
हमें बड़े-बड़े संघर्ष दिखते हैं लेकिन छोटे छोटे स्तर पर चलने वाले संघर्ष का चेहरा कोई देखना-समझना नहीं चाहता. बाजार में निकलने पर बहुत सी आदिवसी महिलाएं दिख जाती हैं पीठ पर बच्चा बांधे हुए और बेहद ही बेफिक्री से काम पर निकलते हुए. कोई ठेले पर सब्जी बेचती हैं तो कोई कोई छोटी-बड़ी दुकानों में काम करती हैं.
ये बिल्कुल जरूरी नहीं है कि महिलाएं किसी बड़ी सी कंपनी में काम करें या ऑफिसर बनें और मंत्री पदों को संभालें. इसके लिए जरूरी ये है कि हर स्तर पर उनके भीतर एक सजगता हो अपने लिए अपने स्थान को बनाए रखने के लिए जो इन महिलाओं में दिखती है.
इनकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि अगर आप इनके पास चले जाइये तो लगेगा ही नहीं कि आप कुछ खरीदने आएं हैं. यहां खरीदने और बेचने वाले का रिश्ता होता है बल्कि लगता है कि गांव की ही किसी चाची-मौसी से ही बात हो रही है.
हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनको बंद ऑफिस में काम करने वाली महिलाएं तो पसंद आती हैं और उनको सम्मान की नजर से देखा जाता है. लेकिन जब कोई महिला फुटपाथ पर सब्जी या इस तरह की चीजें बेचती हैं या कोई ऐसी कोई मजदूरी करती हैं तो उनको एक तरह से बेचारगी की नजर से देखा जाता है या कई बार तिरस्कार की नजर से भी.
जिन मध्यवर्गीय महिलाओं को चुपचाप से घर में बैठे रहना सम्मान जनक लगता है. उन से कहीं अधिक सम्मान की हकदार हैं ये कामगर महिलाएं और ये समाज.
हां, थोड़ा चिंताजनक बात ये है कि इनेमें कई ऐसी महिलाएं भी होती हैं जो उम्र की ढलान पर हैं लेकिन इस तरह से तो बुजुर्ग पुरुष भी काम करते हुए देखे जा सकते हैं इसे एकाकी नजरिये से नहीं देखा जा सकता है फिर तो ये चिंता दोनों संदर्भों में उभरती है.
चिंता तो इस समाज की अन्य स्तरों पर भी अभरती है. कुछ दिन पहले जब झारखंड के एक आदिवासी गांव में जाना हुआ था तो देखा यहां अभी भी प्राकृतिक जीवन बचा हुआ है. लेकिन मालूम हुआ कि लगभग 11 कि.मी. की दूरी पर उड़ीसा बॉर्डर है जहां खनन के कारण सारी प्राकृतिक संपदा खत्म हो गई है. भीतर से एक अजीब बेचैनी महसूस हो रही थी। इतना खूबसूरत जीवन कोई कैसे उजाड़ सकता है क्या अधिकार है किसी भी सरकार या कंपनियों को ऐसा करने का.
जिस गांव में महिलाओं और पुरुषों को सामूहिक नृत्य करते हुए देखा था क्या वहां सामूहिक विलाप की स्थिति नहीं आने वाली है. क्या इन महिलाओं को बाहर के समाज में उसी तरह की आजादी और खुलापन मिल पाएगा या सब कुछ खत्म हो जाएगा. नहीं पता ये संघर्षशील महिलाएं कितना बचा पाएंगी अपना अस्तित्व अपने पूरे समाज सहित.
एक समाज जहां महिलाओं के लिए भी स्पेस है क्या वहा सब कुछ खत्म हो जाएगा एक बड़ा सवाल और एक बड़ी चिंता है. लेकिन इन महिलाओं के चेहरों और जिजीविषा को दखते हुए एक उम्मीद तो उभरती है कि इनका संघर्ष हमेशा जारी रहेगा अपने जीवन और समाज को बचाने के लिए.
Friday, 31 March 2017
सब्जियों की खुशबू
देश की अधिकांश आबादी गांव में रहती है, फिर
भी शहरी संस्कृति को श्रेष्ठ समझा माना जाता है। ‘गंवार’ शब्द
तो इतना गिर गया कि अक्सर ‘बेवकूफ’ के अर्थ में
प्रयोग किया जाता है। शब्दों के इस तरह के अर्थ प्राप्त करने की अपनी राजनीति होती है। गांवों से जुड़ी
चीजों को जिन संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है, उनसे अक्सहर
हमें गावों की संस्कृति को कमतर समझे जाने का अहसास होता है। दरअसल यह गांव के
वजूद, इसकी की अस्मिता को हाशिये पर धकेलने का एक तरीका है। जबकि पर्यावरण
और संस्कृोति की दृष्टि से कई धरोहरों को गांवों ने ही सबसे ज्यादा संभालकर रखा
हुआ है।
यह रोजगार की मजबूरी है कि लोग शहरों
की ओर भाग रहे हैं। हालांकि, शहरी जीवन का अपना एक आकर्षण है, जिसके
साथ आधुनिकता का बोध बहुत गहराई से जुड़ा है। रोजगार और शिक्षा की तलाश में मैं भी
घर से बाहर हूं। समय मिलने पर जब भी उत्तराखंड में अपने गांव जाती हूं तो अपना
गांव-बस्तीो कहीं ज्याेदा सुकून देने वाली शांत जगह लगती है। वहां रहते हुए कभी इस
खूबी का अहसास नहीं हुआ। लेकिन यह एक बाहरी नजर है। पर्यटक भी इसी नजर से इन
पहाड़ों को देखते हैं। इस नजर से सब कुछ खूबसूरत नजर आता है। विकास और आधुनिकता की
दौड़ में गांव और इससे जुड़ी चीजों, बातों और
खूबियों को अप्रासंगिक, पिछड़ी और दोयम दर्जे की करार देने
वाली सभ्यता इन चीजों को अपने ड्राइंग रूम में सजाने की थोड़ी-सी दरियादिली जरूर
दिखा देते हैं।
जब भी मुड़कर अपने गांव की ओर देखती
हूं तो अपने आगे बढ़ने से ज्यादा एक भरे-पूरे समाज के पीछे छूट जाने का अहसास मन
में भर जाता है। वे लोग जो हर साल भूस्खलन, बाढ़ जैसी
त्रासदियों की मार झेलने हुए भी बाहरी दुनिया को मुस्कुंराते हुए नजर आते हैं।
बड़े-बड़े बांधों की राह में खोखले हो चुके पहाड़ों पर बसे ये लोग पहाड़ से विशाल
ह्रदय के साथ सबका स्वाझगत करते हैं।
जब-जब वापस गांव का रुख करती हूं तो ये
सवाल हो भी तीखे होते जाते हैं। हर साल बहुत कुछ बदल जाता है, बहुत
कुछ पुराना पड़ जाता है। आज से 10-15 साल पहले तक जिन गांवों में हर घर में
गाय, भैंस और बैल होते थे, किसी घर में
मुश्किल से ही कोई जानवर नजर आता है। सौ से ज्याहदा घरों के गांव में मुश्किल से 10-12
मवेशी हैं। हां, कुछ जगह 3जी या 4जी
के सिग्नल पहुंचने लगे हैं, लेकिन मवेशियों से नाता टूटता जा रहा
है। या कहें कि वक्तन के साथ लोगों की जरूरतें और प्राथमिकताएं बदल रही हैं।
मेरे लिए इस तरह के बदलाव आधुनिक
अर्थव्यवस्था या विकास के आधुनिक मॉडल के साये में पनप रही इकहरी संस्कृति के
प्रसार की निशानियां हैं। गांव के लोग भी दूध-दही-मट्ठे के लिए बाजार पर उसी तरह
निर्भर होने हैं, जैसे शहरों में होते हैं। गांव में किसी के
यहां ज्याकदा दूध-दही हो तो तो मक्खन और घी के लिए एडवांस में ही पैसे दे दिए जाते
हैं। इसके लिए भी बारी का इंतजार करना पड़ता है। गांव से गांव वाली चीजों को आंखों
से ओछले होते देखना एक अलग किस्मऔ की पीड़ा और आश्चर्य की बात है।
इस बार काफी दिन बाद घर जाना हुआ तो घर
की हरी सब्जी राई और सरसों खाने का बहुत मन था। कुछ अपने घर की तो कुछ
चाचियों-भाभियों द्वारा दी गई। लेकिन खाने के बाद वह उत्साह अजीब निराशा में बदल
गया। पहले होता यह था इन सब्जियों की खुशबू खींच ले जाती थी। अब ना सब्जी में
खुशबू थी, ना पहले वाला स्वाद। पता चला कि गांव के लोगों
ने खेतों में गोबर/राख डालना लगभग छोड़ दिया है। मवेशियों के घटने से गांवों में
प्राकृतिक खाद की भी कमी होने लगी है और यूरिया जैसी उर्वरकों का प्रयोग बढ़ रहा
है। मुझे सब्जियों से गुम होते स्वाद और सुगंध की वजह तलाशने में देर नहीं लगी। न
ही इसके लिए पूरे गांव को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। तरक्की और आधुनिकता की जो
समझ हाल ही के वर्षों में विकसित हुई यह उसी की देन है। दरअसल, ये
गांव वही सीख रहे हैं, जिसे शहरों ने श्रेष्ठो साबित किया है
23 साल 5 महीने 26 दिन की जिंदगी…
23 मार्च को शहादत दिवस के मौके पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) में नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ का मंचन हुआ। इसे प्रसिद्ध अभिनेता और नाटककार पीयूष मिश्रा ने लिखा है। निर्देशक राजकुमार संतोषी ने इस पर फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ फिल्म बनाई है। कैंपस में डेढ़-दो महीने की रिहर्सल के बाद हम नाटक का सफल मंचन कर पाए। खास बात ये रही कि इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर कलाकार ऐसे थे जो पहली बार नाटक कर रहे थे। इससे निर्देशक का काम और भी मुश्किल हो गया था। नाट्यकला में एम.ए और एमफिल करने वाले रोहित कुमार ने इसका निर्देशन किया। रोहित एन.एस.डी (त्रिपुरा) से नाटक में एक साल के डिप्लोमा होल्डर भी हैं।
बस देखने गई थी और बन गई नाटक का हिस्सा…
रोहित 2003 से रंगमंच में सक्रिय हैं। उन्हें हिरावल ‘पटना’ के साथ रंगकर्म का लंबा अनुभव है। लोक और प्रतिरोध के रंगमंच से उनका गहरा जुड़ाव है। लगभग 7 नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं। उन्होंने फेसबुक पर शेयर किया था कि जो भी नाटक से जुड़ना चाहे जुड़ सकता है। इस तरह मैं भी नाटक का हिस्सा बनी। हालांकि, पहले बस देखने भर के लिए रिहर्सल में गई थी, जब अच्छा लगने लगा तो हिस्सा बन गई।
पांच मिनट के रोल से कई बार इरिटेड भी होती थी..
पांच मिनट के रोल से कई बार इरिटेड भी होती थी..
शुरुआती दिनों में एक्सरसाइज और रीडिंग करवाती जाती रही। डेढ घंटे के नाटक में सिर्फ चार से पांच मिनट के रोल को कई बार इरिटेट हो जाती थी। लेकिन नाटक के तैयार होने की प्रक्रिया पहली बार देखी। दर्शक बनकर तो नाटक कई बार देखा। औऱ उस तरह से बैठकर आलोचना भी कई बार की और तारीफ भी। पहली बार देखा एक डायरेक्टर की मेहनत क्या होती है? छोटे से छोटे रोल के लिए भी कितना समय देना होता है और जुनून से लगना पड़ता है। इस तरह समझ आया नाटक सिर्फ लीड रोल वाले का नहीं होता है, एक डॉयलॉग बोलने वाले का भी उतना ही होता है जितना लीड करेक्टर का होता है। सही मायने में नाटक का सबसे बड़ा हीरो डायरेक्टर ही होता है।

शिव के अभिनय ने किया प्रभावित
नाटक के दौरान ही कई बार यह होता था कि खुद ही डॉयलॉग बोलते- बोलते रोंगटे खड़े हो जाते। शिव वर्मा का किरदार करते हुए शिव का बूढे का डॉयलॉग सुनते- सुनते रो जाने को जी करता। उसके आंखों से बहते आंसू। जब मैं कैम्पस में आई। कोर्ट मार्शल में शिव को देखा रामचंदर के रोल में। तब से ही शिव की एक्टिंग ने प्रभावित किया। पूरे नाटक में उसको चुप ही रहना था और आखिर में ही एक दो डॉयलॉग था। लेकिन पूरे नाटक में उसके हाव- भाव ही कुछ ऐसे थे कि पूरा ध्यान उस पर चला गया। और भी कई नाटक देखे जिसमें शिव के अभिनय से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।
मैं नाटक पर लिखते हुए शिव वर्मा के रोल में देखकर सिर्फ शिव पर नहीं लिख सकती। मुझे शिव के पिछले रोल भी याद आते हैं। आर्ट फिल्मों के अभिनेता की झलक दिखती है उसमें। नाटक के दौरान समझ में आया कि असली किरदार तो निर्देशक निभाता है। 25 -26 लोग अपने- अपने किरदार पर अलग अलग तरीके से काम कर रहे थे। लेकिन एक नाटककार के तौर पर रोहित सब पर काम कर रहे थे। मुझे नाटक के दौरान लगातार यह एहसास सालता रहा कि कि मेरा एक छोटा सा किरदार है।अगर इसी को ठीक से नहीं कर पाई। निर्देशक की इतनी मेहनत, मेरा इतना समय सब जाया हो जाएगा। नाटक की शुरूआत की खराब हो गई तो सब चौपट हो जाएगा। क्योंकि वो नाटक की परिस्थितियों की ओर ले जाना वाला पहला सीन है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद एक और का दुख उसका गुस्सा उसको ठीक उसी तरह से जी लेना बहुत जरूरी था।

व्यक्तिगत जिंदगी नाटक पर हो रही थी हावी
बीच में कई दिन घर रहने के बाद जब मैं वापस आई तो मुझे फ्लोर पर उतारा गया। मैंने एक दो दिन ठीक-ठाक कर भी लिया। फिर तीन से चार दिन मैं लगातार बहुत खराब करती रही। उस परिस्थिति को महसूस ही नहीं कर पा रही थी। मेरी व्यक्तिगत जिंदगी यहां पर काफी हद तक प्रभावित कर रही थी। मैं कुछ-कुछ प्रेम में पड़ रही थी और दिमाग उससे इतर कुछ भी सोच नहीं पा रही था। और दिमाग के पेंच को कसना जरूरी समझा और फिर खुद को किसी तरह स्थिर किया।
नाटक के एक दो दिन पहले तक की रिहर्सल में कुछ-कुछ सुधार हुआ। और आखिर के दिन चरित्र को जीने का मसला था मैंने उसे जीने की कोशिश की। भगत सिंह शहादत दिवस के दिन ही पाश की भी हत्या हुई थी। मेरे दिमाग में नाटक के संवाद जिसमें कुछ भगत सिंह और कुछ शिव वर्मा के घूमते रहे। भगत सिंह पर ही गीत ए भगत सिंह तू जिंदा है, और पाश की कविता हम लड़ेंगे साथी घूमती रही। शऱीर में झुरझुरी पैदा होने लगती। किसी साथी ने पूछ भी लिया था कि ठंड लग रही है क्या लेकिन मुझे ठंड नहीं लग रही थी..मेरे शरीर पर जो दाने उभर आए थे उसमें एक दुख था, आक्रोश था, उत्तेजना थी आंसू थे…हालांकि, मैंने इससे पहले कभी अभिनय किया नहीं और इस तरह का अनुभव भी नहीं है कि बेहतर अभिनय कैसे किया जाता है फिर भी मैंने उस वक्त को जीने की कोशिश की। मैं भीतरी तैर पर जिस स्थिति में थी स्टेज पर आकर मैंने उस चीज को प्रकट किया।

नाटक के शुरुआत में पढ़ा गया रोहित वेमुला का खत
जयदेव जब भगत सिंह से पूछता है कि तुम मरने जा रहे हो सरदार, दिल से बोलना तुम्हें इस बात का अफसोस तो नहीं है ? तब भगत सिंह का जवाब कि अपना काला पानी भोगने के बाद जेल से निकलना..एक खूबसूरत- सी लड़की से शादी करना..4-5 गोल मटोल बच्चे पैदा करना और कभी- कभी उन्हें सुनाया करना कि तुम्हारे ऐसे भी चाचा लोग थे। उस वक्त हमएकदम से जिंदा हो जाया करेंगे। इसी नाटक की शुरूआत में रोहित वेमुला का पत्र भी प्रयोग के तौर पर पढा गया था। जिसमें कहा गया था कि मैं लेखक बनाना चाहता था लेकिन आखिर में सिर्फ एक पत्र ही लिख पा रहा हूं। मैं पहली बार आखिरी पत्र पढ रहा हूं।
दोनों के आखिरी वक्त को मैं एक ही तरह से याद कर रही हूं। सारी लड़ाइयां सारे संघर्ष और आखिर में हाथ में कुछ नहीं रह पाता..संघर्ष करते करते मरने वालों को अक्सर भुला दिया जाता है अगर याद रखा भी जाता है तो सिर्फ उसका नाम उसका मकसद इच्छाएं कहां याद रह पाती हैं लोगों को। भगत सिंह और वेमुला दोनों का जाना भीतर एक अजीब स्थिति पैदा कर देता है। नाटक करते-करते भूल जाती थी नाटक का हिस्सा हूं। तमाम आक्रोश दुख उदासनीनता तो कभी गजब की लड़ने की इच्छाएं जागती रहीं।

23 साल 3 महीने 26 दिन की जिंदगी…
दूसरों के डॉयलॉग बोलते हुए सुनती तो कई बार उन परिस्थितियों में पहुंच जाती। नाटक की रिहर्सल के दौरान कई बार बोर हो जाती। वही डॉयलॉग रोज रोज चल रहे हैं। लेकिन फिर अचानक भगत सिंह के रूप में यदुवंश प्रणय की आवाज आ जाती..23 साल 3 महीने 26 दिन की जिंदगी…, एक अन्य डॉयलॉग इसांन के लिए हमारा इश्क किसी से भी कम नहीं है। इसलिए इंसान का खून करने की ख्वाइश रखने का सवाल ही नहीं उठता। हमारा एक मात्र उद्देश्य था कि एक मात्र धमाका करें क्योंकि बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत होती है।
बूढे शिव वर्मा के रूप में शिव की आवाज आती वो वक्त भी एक तथ्य था ये वक्त भी एक तथ्य था। और अन्य डॉयलॉग मैं आज भी जिंदा हूं उस भारत वर्ष में जिसका सपना वो देखा करता था। फिर मैं नाटक को गौर से देखने लगती जैसे कि ये वही दौर चल रहा हो। बटुकेश्वर दत्त शिव वर्मा दो बूढे जो अपनी अपनी वर्तमान की यात्रा कराकर फिर लौट जाते आजादी के दौर में…हो सकता है मेरी बातें अति भावुकतापूर्ण हों लेकिन मैं ठीक इसी तरह से महसूस करती रही।
प्रशासन से सहयोग ना मिल पाने से हुई कई दिक्कतें
नरेश गौतम शुरू शुरू में खूब डायलॉग भूल जाया करते। क्योंकि उन पर प्रोडक्शन मैनेजर की जिम्मेदारी भी थी। लेकिन आखिर तक आते आते उन्होंने एक इलीट क्लास के मार्कंड त्रिवेदी (जवान) का रोल बहुत बेहतरीन तरीके से निभाया। प्रोडक्शन मैनजेर को काफी दिक्कतें हुईं नाटक में एक इलीट (मार्कंड त्रिवेदी) का किरदार निभाने वाले नरेश गौतम को असल में फंड इकट्ठा करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। प्रशासन की ओर से सहयोग ना मिल पाने से काफी दिक्कतें हुईं, लाइट और स्टेज का अरेंजमेंट इन सबमें और कैम्पस से भी इस बार काफी कम मात्रा में फंड इकट्ठा हो पाया। नरेश का भी रंगमंच से पुराना जुड़ाव रहा है। बच्चों के साथ भी वर्कशॉप करते रहते हैं। सबसे जरूरी बात नरेश गोतम ने सबकी चाय और खाने का खूब खयाल रखा।
यदुवंश प्रणय ने भगत सिंह का किरदार अगर इतनी अच्छी तरह से निभाया तो इसका कारण ये भी था कि भगत सिंह पर उन्होंने काफी अध्ययन किया है और भगत सिंह पर अच्छी जानकारी रखते हैं। इसलिए वैचारिक तौर पर भी भगत सिंह लग रहे थे नाटक में। यदुवंश प्रणय और नरेश गौतम, आशीष कुमार, और रोहित कुमार कैम्पस के ऐसे विद्यार्थियों में से हैं जो हर छात्रों से हक के लिए हर मुद्दे पर लड़ने के लिए हमेशा खड़े रहते हैं। काफ्का कैफेटेरिया को जब हटाया जा रहा था तो अन्य छात्रों के साथ-साथ ये दोनों लोग भी बराबर सक्रिय रहे काफ्का कैफेटेरिया को बचाने के लिए। तब सबकी मिली-जुली कोशिश का असर भी दिखा काफ्का कैफेटेरिया को शिफ्ट करने के लिए प्रशासन ने दूसरी जगह दे भी दी। कोई नाटक तब ज्यादा प्रभावी हो जाता है जब आप सोचने समझने वाले हों। सिर्फ अभिनय की तकनीकी जानकारी से काम नहीं चलता।

इंसानी भावनाओं के प्रेम को समझने वाला शख्स था भगत सिंह
भगत सिंह जैसे नाटक को करने के लिए इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी कि भगत सिंह को समझा जाए। उनकी विचारधारा को समझा जाए, उन परिस्थितियों को समझा जाए। समझा जाए इस बात को कि भगत सिंह किस तरह से सोचते थे। वो सिर्फ फांसी पर झूल जाने वाला शख्स नहीं था जैसा कि अमूमन उसे बता दिया जाता है। वो इंसानी भावनाओं के प्रेम को समझने वाला शख्स था। गोले बारूद की संस्कति उसे पसंद नहीं थी बल्कि वो तो इसको एक बदलाव के हथियार के तौर पर देखता था बस। नाटक में भगत सिंह के इस पक्ष को उभारना था। उभारा भी गया।
निर्देशक रोहित कुमार ने कई गेम्स और एक्सरसाइज करवाईं। जिसमें एक एक्सरसाइज ये भी थी कि आपको अपने कैरेक्टर के बारे में सोचना है आंख बंद करके। जैसे मैं एक औरत के किरदार में हूं तो कैसे-कैसे मेरा परिवार रहा होगा। भगत सिंह हूं तो कैसा सोचूंगा। एक कोमा में जाने वाली एक्सरसाइज भी थी। जिसमें सबको अपने-अपने बारे में था जिंदगी की शुरुआत से लेकर अंत तक। इन सबका नाटक के किरदार में डूबने में मदद मिली।
नाटक करते हुए कुछ शब्दों को हटाया भी गया जिसमें महिलाओं की दृष्टि से आपत्तिजनक थे। लैंडियों के लंहगे सूंघते नजर आओगे, या चंद्रशेखर आजाद को गाली देते हुए दिखाना, आनरेबल लेडी का नाजायज बच्चा वाला डायलॉग। रोहित जी ने पहले कुछ वार्निंग वाले अंदाज में कहा कि जिसको नाटक छोड़ के जाना हो पहले ही जा सकता है क्योंकि वो बाद में सबको डांटेंगे भी। मुझे थोड़ा डर लगा कि कैसे डांटेंगे। लेकिन पूरे नाटक में ऐसा बहुत ही कम हुआ कि वो बहुत नाराज हुए हों और हुए भी तो अपने गुस्से को बहुत ही नरम लहजे में जाहिर किया। 25 लोगों की टीम के साथ इतना बड़ा नाटक करना बहुत जोखिम का काम था यह नाटक लगभग डेढ घंटे का रहा। हर रोज कोई ना कोई गायब रहता और उसकी प्रोक्सी कर ली जाती। रोहित कभी कभी झुंझलाते लेकिन फाइनली फिर से सब के सब नाटक में उसी तरह से लग जाते पूरे जुनून के साथ । सबके साथ उनका व्यवहार वाकई में बहुत ही कूल कहा जाएगा।
नाटक के असिस्टेंट डायरेक्टर रहे आशीष कुमार कुछ कुछ खामोश से रहते। लेकिन रिहर्सल में सबको ऑब्जर्व करते और और रह बताते कि कहां कमियां रह गईं, किस काम को किस तरह से करना है। विश्वविद्यालय के ही थियेटर डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रहे आशीष लगातार नाटकों में सक्रिय रहते हैं। नितप्रिय प्रलय भी बराबर गाइड करती रहीं टीम को।उनके पास भी अभिनय का अच्छा–खासा अनुभव भी है। मैंने उनका खिलौना नाटक देखा है जिसमें उन्होंने अच्छा अभिनय किया है।

हम तीनों मित्रों ने किए नाटक के तीन महिला पात्र
गगन दमामा बाज्यो नाटक में महिला पात्र मात्र तीन ही हैं। एक भगत सिंह की मां विद्यावती। दूसरी भगत सिंह की प्रेमिका सोहनी। तीसरी औरत जो कि पंजाब की तमाम माओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। नाटक की तीनों महिला पात्रों का किरदार हम तीनों दोस्तों आरती शर्मा, सागरिका नायक और मैंने किया। इस बीच हम तीनों की दोस्ती कुछ और गहरी हो गई।
आरती में गजब की ऊर्जा है पता नहीं कहां से लाती है। लगातार बोलते रहने और काम करना। नाटक में ये करने से बाज नहीं आई। इसका फायदा ही हुआ नाटक पर उसकी भी बराबर नजर रहती। कोई नहीं आता तो कई पुरुष किरदारों की अच्छी प्रॉक्सी कर लेती। नाटक का एक और सदस्य अर्पित राज तो सबकी प्रॉक्सी करता और सारे डॉयलॉग उसे याद भी हो गए। उसे मजाक में प्रॉक्सी मास्टर कहते हैं सब। आखिर में उसका ये हुनर काम भी आया जब एक किरदार ने अचानक किसी वजह से नाटक छोड़ दिया तो अर्पित ने उस किरदार को बहुत अच्छे से करके दिखाया।
बटुकेश्वर दत्त के किरदार में गौरव चौहान जो वास्तव में अपने हाव भाव से बिल्कुल बूढे लग रहे थे। गौरव थियेटर में लगातार सक्रिय रहा है। सुखदेव के किरदार में सोरभ गुप्ता का अभिनय खासकर जब गुस्सा होता तो बहुत वास्तविक लगता। राजगुरु के भोलेपन को अमित कुमार ने बखूबी निभाया। इसके अलावा बूढा मार्कंड( आशीष गौतम) जेलर (आशुतोष), और हर छोटे-बड़े किरदार ने नाटक को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। आजाद के किरदार में शिवम घाटे से बेहतर कोई लग ही नहीं सकता था। तो मां-पिता के किरदार में पलाश किशन और सागरिका नायक भी अच्छे लग रहे थे। पलाश को सभी लोग मजाक मजाक में रिहर्सल के दौरान पैरी पौणा बाऊजी कहते। और आखिर तक आते-आते सब लोग एक दूसरे के असली नाम के बजाय किरदार के नाम से ही संबोधित करने लगे। बनर्जी का किरदार कर रहे रामलखन ने नाटक से संबंधित प्रोपर्टी बनाई जैसे बंदूक टोपी आदि।
संगीत का मामला दिल और लाइटिंग का जुड़ा है स्टेज से
संगीत का मामला तो दिल से जुड़ा हुआ है और लाइटिंग का स्टेज से। गाना पर गजेंद्र की आवाज ने कमाल किया और काफी कोशिशें कीं कि सबके सुर ठीक से बैठ जाएं लेकिन होता है कि साथ में सब ठीक गाते बाद में फिर से बेसुरेपन पर आ जाते। लेकिन आखिर में उनकी कोशिश कामयाब रही और सबने ठीक ठीक गा लिया। बैकग्राउंड म्यूजिक विवेक कुमार ने दिया। किसी जरूरी काम के कारण नाटक के निर्देशक रोहित कुमार को जाना पड़ गया तो इस बीच सारी जिम्मेदारी आशीष कुमार, नरेश गौतम और यदुवंश प्रणय ने संभाली। निर्देशन में सहयोग कि लिए और जेएनयू से जैनेंद्र को अंतिम समय में उन्होंने भी कुछ अभिनय की कुछ बारिकियों पर काम किया। लाइट सुहास ने दी।
भगवती भाई के रूप में साकेत बिहारी हमेशा से भगवती भाई जैसे ही लगते। समझदार और बड़े। वो तो जैसे उस किरदार के लिए ही बने हुए हों। इतने महत्वपूर्ण नाटक में दुर्गा भाभी का किरदार ना लेना अखरता है जो कि भगत सिंह और अन्य लोगों के साथ बराबर की सहभागी थीं। हमारी टीम ने जब नाटक का मंचन किया तब भी दुर्गा भाभी का किरदार नाटक में नहीं लिया जा सका। मंच पर गायक और गिटारिस्ट के रूप में रवींद्र, ढोलक में धनंजय, हारमोनियम में चेतन, गायक गजेंद्र। इसके अलावा बहुत से साथियों ने सहयोग किया।
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