Tuesday, 4 April 2017

परिधानों के पीछे छिपी स्त्री मन की जकड़बंदी

Related image
स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है- सीमोन द बोउवार का यह कथन वास्तव में सच के बहुत करीब है। स्त्री बनायी जाती है और यह प्रक्रिया दृश्य-अदृश्य रूप से हमेशा चलती रहती है। एक ऐसी प्रक्रिया जो स्वाभाविक सी लगती है। परिधान रोजमर्रा की जरूरतों का एक हिस्सा है। एक ऐसीजरूरत जिसके संबंध में कोई खास स्वस्थ बहस नहीं की जाती है। कपड़ों के आधार पर भी स्त्री पुरुषों को बांटा गया है। जरा सा भी गौर किया जाये तो महिलाओं और पुरुषों के परिधानों का एक स्पष्ट अन्तर देखा जा सकता है।
एक बच्ची जब पैदा होती है तब से लेकर उसे क्या पहनाना शुरू किया जाता है फ्रॉक ना। एक झालर वाली शानदार फ्रॉक। जबकि लड़के के कपड़ों में एक सादा सा परिधान होता है। वो क्या देखती है एक मोहक और चमचमाते परिधान को।और वह उसी तरह की चीजों से जुड़ती चली जाती है। जबकि लड़के के पास कपड़ों के नाम पर चयन की बहुत ज्यादा सुविधाएं भी नहीं होती हैऔर उसे परिधानों के प्रति सजग बनाया भी नहीं जाता है।इधर एक लड़की के व्यवहार में धीरे-धीरे परिधानों के प्रति सजगता बढ़ती जाती है।
परिधान की बनावट में अन्तर किया जाये तो कह सकते हैं कि एक मूलभूत अन्तर यह है कि महिलाओं के कपड़े ढीले ढाले य़ा अधिक चुस्त और फैशनेबुल होते हैं। एक बड़ा अन्तर जो है वो यह है कि महिलाओं के कपड़ों से जेब नदारद रहते हैं। क्या कारण है कि जहां एक पुरुष परिधान में जेबों की भरमार होती है कुर्ते से लेकर पैंट और शर्ट में भी वहीं महिलाओं के परिधान में जेब होती भी है तो किसी कोने पर एक सजावट के लिये। यह मात्र परिधानों या जेब का ना होना नहीं है  यह समाज में बैठी उस गहरी मानसिकता का प्रतीक है जिसके तहत महिला को अर्थव्यवस्था का हिस्सा भी मानने से इनकार किया जाता है। जाहिर है जेब का होना पैसे होने का प्रतीक है। अर्थव्यवस्था से महिलाओं को हमेशा किनारे रखा गया है। हालांकि इधर तस्वीर कुछ बदली है लेकिन तस्वीर पूरी तरह बदली है यह कहना खुद को बेवकूफ बनाना है।
जीन्स में जेब होती हैं जबकि साड़ी या अन्य पारंपरिक परिधानों में जेब नहीं बनायी जाती है यह आम मानसिकता है महिलाएं चलेंगी तो पर्स या बैग लेकर ही चलेंगी। जबकि जेब न होने की परेशानी हर रोज बाहर लिकलने वाली कोई भी महिला समझ सकती है। हालांकि अकसर बड़ी जेब वाली जींस ढूंढने में भी अक्सर लड़कियों को मशक्कत करनी पड़ती है।जेब होने की सुविधा के चलते ही महिलाएं आजकल जीन्स को तरजीह देती हैं।
Related image
बौद्धिक स्त्रियों से भी समाज बडी विरोधाभास पूर्ण अपेक्षाएं रखता है । यदि वे अपने परिधान पर पूरा ध्यान नहीं देती तो लोग उन्हें मर्दाना स्वभाव का कहते हैं और यदि फैशन और मेकअप करती हैं तो लोग कहते हैं कि औरत औरत ही रहती है।–सिमोन
उसे कॉलेज/ऑफिस जाना है और वो फिर से अपने कपड़ो के बक्से से ऐसी ड्रेस निकाल रही है जिसे उसने कल पिछले हफ्ते या दो हफ्तों से नहीं पहना है। यह निर्भर करता है उसके पास कपड़े कितने है। दूसरी ओर लड़का दो ही जोड़ी कपड़ों को हफ्ते दो हफ्ते चला लेता है।मैं अपनी मित्रों से पूछा करती हूं कि वे हमेशा अलग अलग परिधान के लिये इतनी चिन्तित क्यों रहती हैं क्योंकि सिर्फ कपड़ों और मेकअप पर इतना पैसा और समय बर्बाद करने का क्या औचित्य है। तो अक्सर का जवाब होता है फलां सहकर्मी हर रोज नए नए कपड़े पहनती है और यदि मैं नहीं पहनूंगी तो लोग कहेंगे कपड़े नहीं है / गरीब है या कंजूस है इत्यादि इत्यादि। यह मानसिकता है क्या दरअसल । यही ना कि स्त्री को अपने सजाये संवारे रखना बहुत जरूरी है।
आमतौर पर पाश्चात्य परिधानों को अश्लील या संस्कृति को भ्रष्ट करने वाला बताया जाता है और बलात्कार का कारण इनको बताया जाता है और लगातार इसके विरोध में बयान या फरमान जारी होते रहते हैं। जबकि गौर करेंगे तो वर्तमान में पाश्चात्य परिधानों का जो रूप है वह वह वहां की महिलाओं ने वक्त के साथ अपनाया है। 19वीं सदी या उसके बाद तक भी वहां के परिधान भी लम्बे चौड़े एवं काफी हद तक असहज होते थे। गॉन विदद विंड फिल्म की नायिका स्कारलेट जब कपड़े पहनती है तो उसकी परिचारिका उसके कपड़े की बेल्ट को अधिक से अधिक कसने की कोशिश करती है। क्योंकि एक महिला को हमेशा दुबला दिखना चाहिये। या फिर ढीले ढाले परिधान हों। सुविधानुसार कम ही होते हैं।
वहीं मुस्लिम समाज की बात करे तो बुर्का पहने हुए महिलाएं बड़े शहरों में भी बड़े आराम से दिख जाती है। हिंदू समाज की महिलाएं भी घूंघट में दिख जाती हैं।मैंने अपनी एक मित्र से इस बारे में बातचीत की तो उसका स्पष्ट कहना था कि घूंघट बड़ो के प्रति सम्मान दिखाने का एक प्रतीक है जो कहीं से भी गलत नहीं है। मुस्लिम मित्र से बुर्के के औचित्य पर सवाल किया तो असका कहना था स्त्रियों के कुछ अंग ऐसे होते हैं जिसके लिये बुर्का जरूरी है। ये एक युवा पीढ़ीं के विचार हैं।
और परिधानों का बदलना काफी हद तक समाज की मानसिकता का बदलना या बदलने की कोशिश करना होता है। पश्चिम की महिलाएं ना सिर्फ कपडों के मामले में खुली सोच की हैं बल्कि अनकी सोच अन्य मामलों में भी उतनी ही खुली होती है। हालांकि यह हमेशा नहीं होता है।

Image result for painting of a western women
दरअसल चर्चा करने का मूल उद्द्श्य यहां कपड़ों के आकार प्रकार और बनावट नहीं है। बल्कि महिलाओं एवं पुरुषों के परिधान संबंधी आदतों में पैदा हुई भिन्नता की पड़ताल करना है।अन्य कारणों को जिस कारण एक महिला के लिये परिधान असकी जिंदगी कै महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं। और अन्य चीजें कही न कहीं गौण हो जाती है। हालांकि इसमें घर सजाना संवारना, सफाई पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देना और खाना बनाने पर विशेष ध्यान देना भी इसमें शामिल हो सकते है लेकिन फिलहाल इसी पर ही बहस केन्द्रित की जा रही है।लम्बे समय से महिला की मानसिकता को एक हर तरह से खांचे में ढालने का जो काम किया गया, परिधान उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। हालांकि परिधानों की यह जकड़बंदी कहीं टूटती नजर आ रही है तो कहीं मजबूत भी हो रही है।
आज यह काम बाजार कर रहा है। मीडिया के माध्यम से एक अलग ही महिला छवि को परोसा जा रहा है। और परिधानों में आये बदलावों को पहचाना जा सकता है। यह एक जकड़बंदी टूटने के बाद उपजी दूसरी जकड़बंदी का दौर है। और चुनौति यह है कि दोनों ही तरह की जकड़बंदी से आजाद होना है । चाहे वो पारंपरिक हो या बाजार द्वारा पैदा की गयी हो।

Saturday, 1 April 2017

आदिवासी महिलाओं का जीवन संघर्ष और उम्मीद


किसी भी जगह महिलाओं की स्थिति के आधार पर उस जगह के प्रति नजरिया बनता है. रांची मेरे लिए एक नया शहर रहा है. मैंने पहली बार महिलाओं को इतनी बड़ी संख्या में सब्जी बेचते या ठेलों पर काम करते देखा. ऐसा इसलिए भी कि कभी भी आदिवासी क्षेत्रों में नहीं रही हूं. हालांकि अपने गांव और क्षेत्र (उत्तराखंड) में खेतों में या जंगलों में काम करती महिलाओं को देखा है लेकिन औरत का बाजार में बैठना सामान्यत: अच्छा नहीं माना जाता है.

जब भी काम में महिलाओं की भागीदारी की बात होती है तो बड़े-बड़े पदों पर बैठी महिलाओं की छवि दिमाग में कौंधती है. लेकिन छोटे-छोटे और जरूरी कामों में लगी इन अनाम महिलाओं के बारे में शायद ही कभी सोचा जाता है. बाजार में चलते हुए इसी संघर्ष की झलक मिलती है.


हमें बड़े-बड़े संघर्ष दिखते हैं लेकिन छोटे छोटे स्तर पर चलने वाले संघर्ष का चेहरा कोई देखना-समझना नहीं चाहता. बाजार में निकलने पर बहुत सी आदिवसी महिलाएं दिख जाती हैं पीठ पर बच्चा बांधे हुए और बेहद ही बेफिक्री से काम पर निकलते हुए. कोई ठेले पर सब्जी बेचती हैं तो कोई कोई छोटी-बड़ी दुकानों में काम करती हैं.

ये बिल्कुल जरूरी नहीं है कि महिलाएं किसी बड़ी सी कंपनी में काम करें या ऑफिसर बनें और मंत्री पदों को संभालें. इसके लिए जरूरी ये है कि हर स्तर पर उनके भीतर एक सजगता हो अपने लिए अपने स्थान को बनाए रखने के लिए जो इन महिलाओं में दिखती है.

इनकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि अगर आप इनके पास चले जाइये तो लगेगा ही नहीं कि आप कुछ खरीदने आएं हैं. यहां खरीदने और बेचने वाले का रिश्ता होता है बल्कि लगता है कि गांव की ही किसी चाची-मौसी से ही बात हो रही है.

हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनको बंद ऑफिस में काम करने वाली महिलाएं तो पसंद आती हैं और उनको सम्मान की नजर से देखा जाता है. लेकिन जब कोई महिला फुटपाथ पर सब्जी या इस तरह की चीजें बेचती हैं या कोई ऐसी कोई मजदूरी करती हैं तो उनको एक तरह से बेचारगी की नजर से देखा जाता है या कई बार तिरस्कार की नजर से भी.

जिन मध्यवर्गीय महिलाओं को चुपचाप से घर में बैठे रहना सम्मान जनक लगता है. उन से कहीं अधिक सम्मान की हकदार हैं ये कामगर महिलाएं और ये समाज.

हां, थोड़ा चिंताजनक बात ये है कि इनेमें कई ऐसी महिलाएं भी होती हैं जो उम्र की ढलान पर हैं लेकिन इस तरह से तो बुजुर्ग पुरुष भी काम करते हुए देखे जा सकते हैं इसे एकाकी नजरिये से नहीं देखा जा सकता है फिर तो ये चिंता दोनों संदर्भों में उभरती है.

चिंता तो इस समाज की अन्य स्तरों पर भी अभरती है. कुछ दिन पहले जब झारखंड के एक आदिवासी गांव में जाना हुआ था तो देखा यहां अभी भी प्राकृतिक जीवन बचा हुआ है. लेकिन मालूम हुआ कि लगभग 11 कि.मी. की दूरी पर उड़ीसा बॉर्डर है जहां खनन के कारण सारी प्राकृतिक संपदा खत्म हो गई है. भीतर से एक अजीब बेचैनी महसूस हो रही थी। इतना खूबसूरत जीवन कोई कैसे उजाड़ सकता है क्या अधिकार है किसी भी सरकार या कंपनियों को ऐसा करने का.

जिस गांव में महिलाओं और पुरुषों को सामूहिक नृत्य करते हुए देखा था क्या वहां सामूहिक विलाप की स्थिति नहीं आने वाली है. क्या इन महिलाओं को बाहर के समाज में उसी तरह की आजादी और खुलापन मिल पाएगा या सब कुछ खत्म हो जाएगा. नहीं पता ये संघर्षशील महिलाएं कितना बचा पाएंगी अपना अस्तित्व अपने पूरे समाज सहित.

एक समाज जहां महिलाओं के लिए भी स्पेस है क्या वहा सब कुछ खत्म हो जाएगा एक बड़ा सवाल और एक बड़ी चिंता है. लेकिन इन महिलाओं के चेहरों और जिजीविषा को दखते हुए एक उम्मीद तो उभरती है कि इनका संघर्ष हमेशा जारी रहेगा अपने जीवन और समाज को बचाने के लिए.

Friday, 31 March 2017

सब्जियों की खुशबू

देश की अधिकांश आबादी गांव में रहती है, फिर भी शहरी संस्कृति को श्रेष्ठ समझा माना जाता है। गंवारशब्द तो इतना गिर गया कि अक्सर बेवकूफके अर्थ में प्रयोग किया जाता है। शब्दों के इस तरह के अर्थ प्राप्त  करने की अपनी राजनीति होती है। गांवों से जुड़ी चीजों को जिन संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है, उनसे अक्सहर हमें गावों की संस्कृति को कमतर समझे जाने का अहसास होता है। दरअसल यह गांव के वजूद, इसकी की अस्मिता को हाशिये पर धकेलने का एक तरीका है। जबकि पर्यावरण और संस्कृोति की दृष्टि से कई धरोहरों को गांवों ने ही सबसे ज्यादा संभालकर रखा हुआ है।


यह रोजगार की मजबूरी है कि लोग शहरों की ओर भाग रहे हैं। हालांकि, शहरी जीवन का अपना एक आकर्षण है, जिसके साथ आधुनिकता का बोध बहुत गहराई से जुड़ा है। रोजगार और शिक्षा की तलाश में मैं भी घर से बाहर हूं। समय मिलने पर जब भी उत्तराखंड में अपने गांव जाती हूं तो अपना गांव-बस्तीो कहीं ज्याेदा सुकून देने वाली शांत जगह लगती है। वहां रहते हुए कभी इस खूबी का अहसास नहीं हुआ। लेकिन यह एक बाहरी नजर है। पर्यटक भी इसी नजर से इन पहाड़ों को देखते हैं। इस नजर से सब कुछ खूबसूरत नजर आता है। विकास और आधुनिकता की दौड़ में गांव और इससे जुड़ी चीजों, बातों और खूबियों को अप्रासंगिक, पिछड़ी और दोयम दर्जे की करार देने वाली सभ्यता इन चीजों को अपने ड्राइंग रूम में सजाने की थोड़ी-सी दरियादिली जरूर दिखा देते हैं।


जब भी मुड़कर अपने गांव की ओर देखती हूं तो अपने आगे बढ़ने से ज्यादा एक भरे-पूरे समाज के पीछे छूट जाने का अहसास मन में भर जाता है। वे लोग जो हर साल भूस्खलन, बाढ़ जैसी त्रासदियों की मार झेलने हुए भी बाहरी दुनिया को मुस्कुंराते हुए नजर आते हैं। बड़े-बड़े बांधों की राह में खोखले हो चुके पहाड़ों पर बसे ये लोग पहाड़ से विशाल ह्रदय के साथ सबका स्वाझगत करते हैं।

जब-जब वापस गांव का रुख करती हूं तो ये सवाल हो भी तीखे होते जाते हैं। हर साल बहुत कुछ बदल जाता है, बहुत कुछ पुराना पड़ जाता है। आज से 10-15 साल पहले तक जिन गांवों में हर घर में गाय, भैंस और बैल होते थे, किसी घर में मुश्किल से ही कोई जानवर नजर आता है। सौ से ज्याहदा घरों के गांव में मुश्किल से 10-12 मवेशी हैं। हां, कुछ जगह 3जी या 4जी के सिग्नल पहुंचने लगे हैं, लेकिन मवेशियों से नाता टूटता जा रहा है। या कहें कि वक्तन के साथ लोगों की जरूरतें और प्राथमिकताएं बदल रही हैं।


मेरे लिए इस तरह के बदलाव आधुनिक अर्थव्यवस्था या विकास के आधुनिक मॉडल के साये में पनप रही इकहरी संस्कृति के प्रसार की निशानियां हैं। गांव के लोग भी दूध-दही-मट्ठे के लिए बाजार पर उसी तरह निर्भर होने हैं, जैसे शहरों में होते हैं। गांव में किसी के यहां ज्याकदा दूध-दही हो तो तो मक्खन और घी के लिए एडवांस में ही पैसे दे दिए जाते हैं। इसके लिए भी बारी का इंतजार करना पड़ता है। गांव से गांव वाली चीजों को आंखों से ओछले होते देखना एक अलग किस्मऔ की पीड़ा और आश्चर्य की बात है।

इस बार काफी दिन बाद घर जाना हुआ तो घर की हरी सब्जी राई और सरसों खाने का बहुत मन था। कुछ अपने घर की तो कुछ चाचियों-भाभियों द्वारा दी गई। लेकिन खाने के बाद वह उत्साह अजीब निराशा में बदल गया। पहले होता यह था इन सब्जियों की खुशबू खींच ले जाती थी। अब ना सब्जी में खुशबू थी, ना पहले वाला स्वाद। पता चला कि गांव के लोगों ने खेतों में गोबर/राख डालना लगभग छोड़ दिया है। मवेशियों के घटने से गांवों में प्राकृतिक खाद की भी कमी होने लगी है और यूरिया जैसी उर्वरकों का प्रयोग बढ़ रहा है। मुझे सब्जियों से गुम होते स्वाद और सुगंध की वजह तलाशने में देर नहीं लगी। न ही इसके लिए पूरे गांव को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। तरक्की और आधुनिकता की जो समझ हाल ही के वर्षों में विकसित हुई यह उसी की देन है। दरअसल, ये गांव वही सीख रहे हैं, जिसे शहरों ने श्रेष्ठो साबित किया है

23 साल 5 महीने 26 दिन की जिंदगी…

23 मार्च को शहादत दिवस के मौके पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) में नाटक ‘गगन दमामा बाज्यो’ का मंचन हुआ। इसे प्रसिद्ध अभिनेता और नाटककार पीयूष मिश्रा ने लिखा है। निर्देशक राजकुमार संतोषी ने इस पर फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ फिल्म बनाई है। कैंपस में डेढ़-दो महीने की रिहर्सल के बाद हम नाटक का सफल मंचन कर पाए। खास बात ये रही कि इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर कलाकार ऐसे थे जो पहली बार नाटक कर रहे थे। इससे निर्देशक का काम और भी मुश्किल हो गया था। नाट्यकला में एम.ए और एमफिल करने वाले रोहित कुमार ने इसका निर्देशन किया। रोहित एन.एस.डी (त्रिपुरा) से नाटक में एक साल के डिप्लोमा होल्डर भी हैं।
बस देखने गई थी और बन गई नाटक का हिस्सा…
रोहित 2003 से रंगमंच में सक्रिय हैं। उन्हें हिरावल ‘पटना’ के साथ रंगकर्म का लंबा अनुभव है। लोक और प्रतिरोध के रंगमंच से उनका गहरा जुड़ाव है। लगभग 7 नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं। उन्होंने फेसबुक पर शेयर किया था कि जो भी नाटक से जुड़ना चाहे जुड़ सकता है। इस तरह मैं भी नाटक का हिस्सा बनी। हालांकि, पहले बस देखने भर के लिए रिहर्सल में गई थी, जब अच्छा लगने लगा तो हिस्सा बन गई।



पांच मिनट के रोल से कई बार इरिटेड भी होती थी..
शुरुआती दिनों में एक्सरसाइज और  रीडिंग करवाती जाती रही। डेढ घंटे के नाटक में सिर्फ चार से पांच मिनट के रोल को कई बार इरिटेट हो जाती थी। लेकिन नाटक के तैयार होने की प्रक्रिया पहली बार देखी। दर्शक बनकर तो नाटक कई बार देखा। औऱ उस तरह से बैठकर आलोचना भी कई बार की और तारीफ भी। पहली बार देखा एक  डायरेक्टर की मेहनत क्या होती है?  छोटे से छोटे रोल के लिए भी कितना समय देना होता है और जुनून से लगना पड़ता है। इस तरह समझ आया नाटक सिर्फ लीड रोल वाले का नहीं होता है, एक डॉयलॉग बोलने वाले का भी उतना ही होता है जितना लीड करेक्टर का होता है। सही मायने में नाटक का सबसे बड़ा हीरो डायरेक्टर ही होता है।
Image may contain: 1 person, sitting, hat and living room
शिव के अभिनय ने किया प्रभावित
नाटक के दौरान ही कई बार यह होता था कि खुद ही डॉयलॉग बोलते- बोलते रोंगटे खड़े हो जाते। शिव वर्मा का किरदार करते हुए शिव का बूढे का डॉयलॉग सुनते- सुनते रो जाने को जी करता। उसके आंखों से बहते आंसू। जब मैं कैम्पस में आई। कोर्ट मार्शल में शिव को देखा रामचंदर के रोल में। तब से ही शिव की एक्टिंग ने प्रभावित किया। पूरे नाटक में उसको चुप ही रहना था और आखिर में ही एक दो डॉयलॉग था। लेकिन पूरे नाटक में उसके हाव- भाव ही कुछ ऐसे थे कि पूरा ध्यान उस पर चला गया। और भी कई नाटक देखे जिसमें शिव के अभिनय से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।
मैं नाटक पर लिखते हुए शिव वर्मा के रोल में देखकर सिर्फ शिव पर नहीं लिख सकती। मुझे शिव के पिछले रोल भी याद आते हैं। आर्ट फिल्मों के अभिनेता की झलक दिखती है उसमें। नाटक के दौरान समझ में आया कि असली किरदार तो निर्देशक निभाता है। 25 -26 लोग अपने- अपने किरदार पर अलग अलग तरीके से काम कर रहे थे। लेकिन एक नाटककार के तौर पर रोहित सब पर काम कर रहे थे। मुझे नाटक के दौरान लगातार यह एहसास सालता रहा कि कि मेरा एक छोटा सा किरदार है।अगर इसी को ठीक से नहीं कर पाई। निर्देशक की इतनी मेहनत, मेरा इतना समय सब जाया हो जाएगा। नाटक की शुरूआत की खराब हो गई तो सब चौपट हो जाएगा। क्योंकि वो नाटक की परिस्थितियों की ओर ले जाना वाला पहला सीन है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद एक और का दुख उसका गुस्सा उसको ठीक उसी तरह से जी लेना बहुत जरूरी था।
Image may contain: 1 person, smiling, standing
व्यक्तिगत जिंदगी नाटक पर हो रही थी हावी
बीच में कई दिन घर रहने के बाद जब मैं वापस आई तो मुझे फ्लोर पर उतारा गया। मैंने एक दो दिन ठीक-ठाक कर भी लिया। फिर तीन से चार दिन मैं लगातार बहुत खराब करती रही। उस परिस्थिति को महसूस ही नहीं कर पा रही थी। मेरी व्यक्तिगत जिंदगी यहां पर काफी हद तक प्रभावित कर रही थी। मैं कुछ-कुछ प्रेम में पड़ रही थी और दिमाग उससे इतर कुछ भी सोच नहीं पा रही था। और दिमाग के पेंच को कसना जरूरी समझा और फिर खुद को किसी तरह स्थिर किया।
नाटक के एक दो दिन पहले तक की रिहर्सल में कुछ-कुछ सुधार हुआ। और आखिर के दिन चरित्र को जीने का मसला था मैंने उसे जीने की कोशिश की। भगत सिंह शहादत दिवस के दिन ही पाश की भी हत्या हुई थी। मेरे दिमाग में नाटक के संवाद जिसमें कुछ भगत सिंह और कुछ शिव वर्मा के घूमते रहे। भगत सिंह पर ही गीत ए भगत सिंह तू जिंदा है, और पाश की कविता हम लड़ेंगे साथी घूमती रही। शऱीर में झुरझुरी पैदा होने लगती। किसी साथी ने पूछ भी लिया था कि ठंड लग रही है क्या लेकिन मुझे ठंड नहीं लग रही थी..मेरे शरीर पर जो दाने उभर आए थे उसमें एक दुख था, आक्रोश था, उत्तेजना थी आंसू थे…हालांकि, मैंने इससे पहले कभी अभिनय किया नहीं और इस तरह का अनुभव भी नहीं है कि बेहतर अभिनय कैसे किया जाता है फिर भी मैंने उस वक्त को जीने की कोशिश की। मैं भीतरी तैर पर जिस स्थिति में थी स्टेज पर आकर मैंने उस चीज को प्रकट किया।
Image may contain: one or more people and people standing
नाटक के शुरुआत में पढ़ा गया रोहित वेमुला का खत 
जयदेव जब भगत सिंह से पूछता है कि तुम मरने जा रहे हो सरदार, दिल से बोलना तुम्हें इस बात का अफसोस तो नहीं है ? तब भगत सिंह का जवाब कि अपना काला पानी भोगने के बाद जेल से निकलना..एक खूबसूरत- सी लड़की से शादी करना..4-5 गोल मटोल बच्चे पैदा करना और कभी- कभी उन्हें सुनाया करना कि तुम्हारे ऐसे भी चाचा लोग थे। उस वक्त हमएकदम से जिंदा हो जाया करेंगे। इसी नाटक की शुरूआत में रोहित वेमुला का पत्र भी प्रयोग के तौर पर पढा गया था। जिसमें कहा गया था कि मैं लेखक बनाना चाहता था लेकिन आखिर में सिर्फ एक पत्र ही लिख पा रहा हूं। मैं पहली बार आखिरी पत्र पढ रहा हूं।
दोनों के आखिरी वक्त को मैं एक ही तरह से याद कर रही हूं। सारी लड़ाइयां सारे संघर्ष और आखिर में हाथ में कुछ नहीं रह पाता..संघर्ष करते करते मरने वालों को अक्सर भुला दिया जाता है अगर याद रखा भी जाता है तो सिर्फ उसका नाम उसका मकसद इच्छाएं कहां याद रह पाती हैं लोगों को। भगत सिंह और वेमुला दोनों का जाना भीतर एक अजीब स्थिति पैदा कर देता है। नाटक करते-करते भूल जाती थी नाटक का हिस्सा हूं। तमाम आक्रोश दुख उदासनीनता तो कभी गजब की लड़ने की इच्छाएं जागती रहीं।
Image may contain: one or more people, people standing and night
23 साल 3 महीने 26 दिन की जिंदगी…
दूसरों के डॉयलॉग बोलते हुए सुनती तो कई बार उन परिस्थितियों में पहुंच जाती। नाटक की रिहर्सल के दौरान कई बार बोर हो जाती। वही डॉयलॉग रोज रोज चल रहे हैं। लेकिन फिर अचानक भगत सिंह के रूप में यदुवंश प्रणय की आवाज आ जाती..23 साल 3 महीने 26 दिन की जिंदगी…, एक अन्य डॉयलॉग इसांन के लिए हमारा इश्क किसी से भी कम नहीं है। इसलिए इंसान का खून करने की ख्वाइश रखने का सवाल ही नहीं उठता। हमारा एक मात्र उद्देश्य था कि एक मात्र धमाका करें क्योंकि बहरों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत होती है।
बूढे शिव वर्मा के रूप में शिव की आवाज आती वो वक्त भी एक तथ्य था ये वक्त भी एक तथ्य था। और अन्य डॉयलॉग मैं आज भी जिंदा हूं उस भारत वर्ष में जिसका सपना वो देखा करता था। फिर मैं नाटक को गौर से देखने लगती जैसे कि ये वही दौर चल रहा हो। बटुकेश्वर दत्त शिव वर्मा दो बूढे जो अपनी अपनी वर्तमान की यात्रा कराकर फिर लौट जाते आजादी के दौर में…हो सकता है मेरी बातें अति भावुकतापूर्ण हों लेकिन मैं ठीक इसी तरह से महसूस करती रही।
प्रशासन से सहयोग ना मिल पाने से हुई कई दिक्कतें
नरेश गौतम शुरू शुरू में खूब डायलॉग भूल जाया करते। क्योंकि उन पर प्रोडक्शन मैनेजर की जिम्मेदारी भी थी। लेकिन आखिर तक आते आते उन्होंने एक इलीट क्लास के मार्कंड त्रिवेदी (जवान) का रोल बहुत बेहतरीन तरीके से निभाया। प्रोडक्शन मैनजेर को काफी दिक्कतें हुईं नाटक में एक इलीट (मार्कंड त्रिवेदी) का किरदार निभाने वाले नरेश गौतम को असल में फंड इकट्ठा करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। प्रशासन की ओर से सहयोग ना मिल पाने से काफी दिक्कतें हुईं, लाइट और स्टेज का अरेंजमेंट इन सबमें और कैम्पस से भी इस बार काफी कम मात्रा में फंड इकट्ठा हो पाया। नरेश का भी रंगमंच से पुराना जुड़ाव रहा है। बच्चों के साथ भी वर्कशॉप करते रहते हैं। सबसे जरूरी बात नरेश गोतम ने सबकी चाय और खाने का खूब खयाल रखा।
यदुवंश प्रणय ने भगत सिंह का किरदार अगर इतनी अच्छी तरह से निभाया तो इसका कारण ये भी था कि भगत सिंह पर उन्होंने काफी अध्ययन किया है और भगत सिंह पर अच्छी जानकारी रखते हैं। इसलिए वैचारिक तौर पर भी भगत सिंह लग रहे थे नाटक में। यदुवंश प्रणय और नरेश गौतम, आशीष कुमार, और रोहित कुमार कैम्पस के ऐसे विद्यार्थियों में से हैं जो हर छात्रों से हक के लिए हर मुद्दे पर लड़ने के लिए हमेशा खड़े रहते हैं। काफ्का कैफेटेरिया को जब हटाया जा रहा था तो अन्य छात्रों के साथ-साथ ये दोनों लोग भी बराबर सक्रिय रहे काफ्का कैफेटेरिया को बचाने के लिए। तब सबकी मिली-जुली कोशिश का असर भी दिखा काफ्का कैफेटेरिया को शिफ्ट करने के लिए प्रशासन ने दूसरी जगह दे भी दी। कोई नाटक तब ज्यादा प्रभावी हो जाता है जब आप सोचने समझने वाले हों। सिर्फ अभिनय की तकनीकी जानकारी से काम नहीं चलता।

Image may contain: 3 people, people standing, shoes and night
इंसानी भावनाओं के प्रेम को समझने वाला शख्स था भगत सिंह
भगत सिंह जैसे नाटक को करने के लिए इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी कि भगत सिंह को समझा जाए। उनकी विचारधारा को समझा जाए, उन परिस्थितियों को समझा जाए। समझा जाए इस बात को कि भगत सिंह किस तरह से सोचते थे। वो सिर्फ फांसी पर झूल जाने वाला शख्स नहीं था जैसा कि अमूमन उसे बता दिया जाता है। वो इंसानी भावनाओं के प्रेम को समझने वाला शख्स था। गोले बारूद की संस्कति उसे पसंद नहीं थी बल्कि वो तो इसको एक बदलाव के हथियार के तौर पर देखता था बस। नाटक में भगत सिंह के इस पक्ष को उभारना था। उभारा भी गया।
निर्देशक रोहित कुमार ने कई गेम्स और एक्सरसाइज करवाईं। जिसमें एक एक्सरसाइज ये भी थी कि आपको अपने कैरेक्टर के बारे में सोचना है आंख बंद करके। जैसे मैं एक औरत के किरदार में हूं तो कैसे-कैसे मेरा परिवार रहा होगा। भगत सिंह हूं तो कैसा सोचूंगा। एक कोमा में जाने वाली एक्सरसाइज भी थी। जिसमें सबको अपने-अपने बारे में था जिंदगी की शुरुआत से लेकर अंत तक। इन सबका नाटक के किरदार में डूबने में मदद मिली।
नाटक करते हुए कुछ शब्दों को हटाया भी गया जिसमें महिलाओं की दृष्टि  से आपत्तिजनक थे। लैंडियों के लंहगे सूंघते नजर आओगे, या चंद्रशेखर आजाद को गाली देते हुए दिखाना, आनरेबल लेडी का नाजायज बच्चा वाला डायलॉग। रोहित जी ने पहले कुछ वार्निंग वाले अंदाज में कहा कि जिसको नाटक छोड़ के जाना हो पहले ही जा सकता है क्योंकि वो बाद में सबको डांटेंगे भी। मुझे थोड़ा डर लगा कि कैसे डांटेंगे। लेकिन पूरे नाटक में ऐसा बहुत ही कम हुआ कि वो बहुत नाराज हुए हों और हुए भी तो अपने गुस्से को बहुत ही नरम लहजे में जाहिर किया। 25 लोगों की टीम के साथ इतना बड़ा नाटक करना बहुत जोखिम का काम था यह नाटक लगभग डेढ घंटे का रहा। हर रोज कोई ना कोई गायब रहता और उसकी प्रोक्सी कर ली जाती। रोहित कभी कभी झुंझलाते लेकिन फाइनली फिर  से सब के सब नाटक में उसी तरह से लग जाते पूरे जुनून के साथ । सबके साथ उनका व्यवहार वाकई में बहुत ही कूल कहा जाएगा।
नाटक के असिस्टेंट डायरेक्टर रहे आशीष कुमार कुछ कुछ खामोश से रहते। लेकिन रिहर्सल में सबको ऑब्जर्व करते और और रह बताते कि कहां कमियां रह गईं, किस काम को किस तरह से करना है। विश्वविद्यालय के ही थियेटर डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रहे आशीष लगातार नाटकों में सक्रिय रहते हैं। नितप्रिय प्रलय भी बराबर गाइड करती रहीं टीम को।उनके पास भी अभिनय का अच्छा–खासा अनुभव भी है। मैंने उनका खिलौना नाटक देखा है जिसमें उन्होंने अच्छा अभिनय किया है।

Image may contain: 15 people, people sitting, crowd, night and outdoor
हम तीनों मित्रों ने किए नाटक के तीन महिला पात्र
गगन दमामा बाज्यो नाटक में महिला पात्र मात्र तीन ही हैं। एक भगत सिंह की मां विद्यावती। दूसरी भगत सिंह की प्रेमिका सोहनी। तीसरी औरत जो कि पंजाब की तमाम माओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। नाटक की तीनों महिला पात्रों का किरदार हम तीनों दोस्तों आरती शर्मा, सागरिका नायक और मैंने किया। इस बीच हम तीनों की दोस्ती कुछ और गहरी हो गई।
आरती में गजब की ऊर्जा है पता नहीं कहां से लाती है। लगातार बोलते रहने और काम करना। नाटक में ये करने से बाज नहीं आई। इसका फायदा ही हुआ नाटक पर उसकी भी बराबर नजर रहती। कोई नहीं आता तो कई पुरुष किरदारों की अच्छी प्रॉक्सी कर लेती। नाटक का एक और सदस्य अर्पित राज तो सबकी प्रॉक्सी करता और सारे डॉयलॉग उसे याद भी हो गए। उसे मजाक में प्रॉक्सी मास्टर कहते हैं सब। आखिर में उसका ये हुनर काम भी आया जब एक किरदार ने अचानक किसी वजह से नाटक छोड़ दिया तो अर्पित ने उस किरदार को बहुत अच्छे से करके दिखाया।
बटुकेश्वर दत्त के किरदार में गौरव चौहान जो वास्तव में अपने हाव भाव से बिल्कुल बूढे लग रहे थे। गौरव थियेटर में लगातार सक्रिय रहा है। सुखदेव के किरदार में सोरभ गुप्ता का अभिनय खासकर जब गुस्सा होता तो बहुत वास्तविक लगता। राजगुरु के भोलेपन को अमित कुमार ने बखूबी निभाया। इसके अलावा बूढा मार्कंड( आशीष गौतम) जेलर (आशुतोष), और हर छोटे-बड़े किरदार ने नाटक को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। आजाद के किरदार में शिवम घाटे से बेहतर कोई लग ही नहीं सकता था। तो मां-पिता के किरदार में पलाश किशन और सागरिका नायक भी अच्छे लग रहे थे। पलाश को सभी लोग मजाक मजाक में रिहर्सल के दौरान पैरी पौणा बाऊजी कहते। और आखिर तक आते-आते सब लोग एक दूसरे के असली नाम के बजाय किरदार के नाम से ही संबोधित करने लगे। बनर्जी का किरदार कर रहे रामलखन ने नाटक से संबंधित प्रोपर्टी बनाई जैसे बंदूक टोपी आदि।

संगीत का मामला दिल और लाइटिंग का जुड़ा है स्टेज से
संगीत का मामला तो दिल से जुड़ा हुआ है और लाइटिंग का स्टेज से। गाना पर गजेंद्र की आवाज ने कमाल किया और काफी कोशिशें कीं कि सबके सुर ठीक से बैठ जाएं लेकिन होता है कि साथ में सब ठीक गाते बाद में फिर से बेसुरेपन पर आ जाते। लेकिन आखिर में उनकी कोशिश कामयाब रही और सबने ठीक ठीक गा लिया। बैकग्राउंड म्यूजिक विवेक कुमार ने दिया। किसी जरूरी काम के कारण नाटक के निर्देशक रोहित कुमार को जाना पड़ गया तो इस बीच सारी जिम्मेदारी आशीष कुमार, नरेश गौतम और यदुवंश प्रणय ने संभाली। निर्देशन में सहयोग कि लिए और जेएनयू से जैनेंद्र को अंतिम समय में उन्होंने भी कुछ अभिनय की कुछ बारिकियों पर काम किया। लाइट सुहास ने दी।
भगवती भाई के रूप में साकेत बिहारी हमेशा से भगवती भाई जैसे ही लगते। समझदार और बड़े। वो तो जैसे उस किरदार के लिए ही बने हुए हों। इतने महत्वपूर्ण नाटक में दुर्गा भाभी का किरदार ना लेना अखरता है जो कि भगत सिंह और अन्य लोगों के साथ बराबर की सहभागी थीं। हमारी टीम ने जब नाटक का मंचन किया तब भी दुर्गा भाभी का किरदार नाटक में नहीं लिया जा सका। मंच पर गायक और गिटारिस्ट के रूप में रवींद्र, ढोलक में धनंजय, हारमोनियम में चेतन, गायक गजेंद्र। इसके अलावा बहुत से साथियों ने सहयोग किया।

Monday, 13 February 2017

फूलों की महक में लिपटे जज्बात

मैं अक्सर तुम्हें याद करती हूं जैसे कोई भी प्रेमिका करती है याद। तुम उतने ही सुंदर लगते हो जितने लगा करते थे। तुम्हें याद करते हुए मैं बहुत कुछ सहेज रही होती हूं,वे फूल जिसमें छिपे हैं तुम्हारे जज्बात, जिंदगी के वे हसीन पल, हमारा प्रेम और ना जाने क्या-क्या।

जब मैं घर गई थी और तोड़ लाई थी एक बुरांस, एक गुच्छा फ्यूंली भी। बुरांश के साथ ले आई थी एक हिस्सा पहाड़ी छांव और फ्यूंली में तो मिट्टी ही थी हमारे ही प्रेम की। फ्यूंली में लिपटे हुए मैं तुम्हें प्रेम करती हूं। पहाड़ों की मिट्टी में लिपटा प्रेम। एक प्रेम कथा हमेशा लौट आती है जिंदगी की ओर। उफ्फ तुम्हारा होना कितना कुछ होना है। और तुम्हारा न होना क्या है कैसे कहूं? मैं देखती हूं खेतों से बहता हुआ पानी और मुझे तुम्हारी एक कविता याद आती है। याद आता है एक सपना।


मेरी किताबों के बीच के पन्नों में तुम्हारे गुलदाउदी के फूल अब भी हैं। अब भी डाकिए के हाथ याद आई चिट्ठी और उस चिट्ठी में भेजी गई तुम्हारी मुक्ति बोध की कविता याद है। पर उससे अधिक याद है तुम्हारी कविता। जिसके एक पन्ने बाद ही मैंने फिर उसी किताब में बुरांस रख लिए हैं। और फ्यूंलियों से नन्हीं कलियां फूट रही हैं। तुम जानते हो ना ये तुम्हारी सांसे हैं।

यह क्या अब बुरांस सूखने से लगे हैं। मैं जानती हूं प्रियतम ये हमारा प्रेम है जो सूखता हुआ लग रहा है, पर क्या ये मुमकिन है। नहीं न उन्हीं में से बहुत कुछ रिस रहा है। उसका लाल रंग दिशाओं की लाली बन गया है। तभी तो चलती बस में बांज के पौधे चलने लगते हैं साथ-साथ और उस साथ में मुझे लोधी गार्डन के फूल भी याद आते हैं और याद आते हैं ठेठ टिशू के फूल भी, दूर तक अपनी मिट्टी के लपेटे हुए।

कहते हैं कि फूल खत्म हो हो रहे हैं, मेरे हिस्से के ऐसा तो नहीं है ना। तुम जानते हो ना कि ये फूल एक दिन मेरे हिस्से की जिंदगी को डुबोकर रहेंगे या कर देंगे आबाद। मुझे खूब याद आता है वसंत और उस वसंत का मौसम जहां अनजाने ही कुछ महसूस करने को दिल करता है। याद आता है एक सपना। यही ये फूल हैं जो मुझे डूबने नहीं देंगे। हर बार मैं उठ खड़ी होऊंगी अंजुली भर प्रेम लेकर और तुम भी उठ खड़े हो आओगे फिर से मेरे स्वागत में, ठीक अपनी हथेलियों में इन्हीं फूलों को भरकर। मैं देखना चाहती हूं पलाश भरे तुम्हारे जंगलों को। मैं जानती हूं, जब तक तुम हो, जब तक तुम्हारे दिए हुए जंगल है और उन जंगलों में आग है, प्यास है, मैं तब तक हूं। और मैं हमेशा ये भी सोचती हूं कि ये हमेशा रहें वैसे ही जैसे मेरे लिए तुम्हारी बाहें, तुम्हारी फैलाई हथेलियां और उन हथेलियों में भरा हुआ प्यार भरा जंगल।

पता है मैंने प्रेम किया है उसके सपनों को और उन सपनों से लौटता है मेरा प्यार है। हर फूल के गुजरने से मुझे प्रेम का एहसास होता है। दरअसल इनमें ताकत ही ऐसी है कि इनकी खुद की एक दुनिया है। उस दुनिया को न तुम छोड़ सकतो हो, न ही मैं छोड़ सकती हूं। ये दुनिया तुम से है और तुम उन्हीं अनगिनत फूलों में से एक हो। तुम्हें मैंने चुना नहीं मैंने तुम्हे महसूस किया है। तुम खिले हो मेरे भीतर। तुम जब भी याद आते हो तो मुझे बार-बार वही गुलदाउदी याद आता है।

मुझे तुम याद करते होगे, तो तुम्हे याद आता होगा ऊंचे डांडों में खिला एक सुर्ख बुरांस। हमने एक लंबा समय कहीं साथ गुजारने की बात कही थी, एक ऊंची पहाड़ी पर। और उसके नीचे बहती हुई लंबी नदी में। मुझे याद आता है एक सपना, हवा में उड़ती मेरी बांहें दोनों ओर बहता पानी और उसके किनारे एक महकती घाटी उन घाटियों से उड़ती फूलों की खुशबू। तुम्हारे हाथों बने एक रेखाचित्र में मेरी वही छवि। मैं वही रेखाचित्र हो गई हूं।

मैं करती हूं एक चांद का इंतजार और तुम्हें वो पसंद नहीं। मैं कहती हूं, ठीक है आओ न इस नदी में भी चांद है। तुम ये नहीं जानते ये फूल और ये नदियां, ये पहाड़ हमेशा उठ खड़े होने की हिम्मत रखते हैं। ये जंगल सूने नहीं होते बल्कि ये शांत होते हैं और उस शांति में एक गीत है। उन गीतों का साथ देते हैं अनगिनत पक्षी। देखो न मेरी घुघूती हिलांस इन्हीं की संगत को बढाती हैं। घुघूती जानती हैं उन्हें कब चहकना है। जानती हैं ये नदियां, कब अपने वेग में आना है।

दरअसल ये फूल टूटते नहीं बिखरते नहीं बल्कि बहुत कुछ चुनते हैं अपने लिए। वो चल देते हैं अपने काम पर फिर लौटते हैं एक नई ऊर्जा के साथ। एक नए सम्मान के साथ वो अपनी याद दिलाते हैं सपनों का वो फूल फिर आता है याद।

मैं महकती हूं। मैं जानती हूं, जहां जंगल नहीं वहां भी उग सकते हैं फूल। फूलों पर कितनी कविताएं याद आती हैं, खूब याद आते हैं लोकगीत और उन गीतों में छुपी हुई प्रेमकथाएं। मैं सोच रही हूं फ्यूली तुम अपने प्रेम में कितनी जिंदा हो अभी भी। देखो न मैं भी यहीं सोच रही हूं ऐसे ही तो मैं भी जिंदा हूं।

जिंदा होना क्या प्रेम होना है। प्रेम के मौसम में मैं फिर जिंदा हो उठूंगी। तुम जब भूल चुके होगे। तुम्हारे आंगन की देहरी पर भी जाग उठेगा एक फूल और उस फूल का नाम तुम ही रखना। एक सुंदर सा नाम। जिसके नाम से एक प्रेमकथा फिर से हो उठे साकार। नहीं, नहीं मैं कहीं जाना नहीं चाहती। मैं एक फूल बनकर जीना चाहती हूं तुम्हारे ही बीच। उन तमाम बाधाओं को पार करके। जहां दो अलग अलग समाज नहीं होंगे। जहां बस दो फूल होंगे। उतने ही प्यारे, जितने प्यार की किसी को जरूरत होती है जिंदा रहने भर, इस दुनिया में ताजी हवा और खुशबू को बरकरार रखने के लिए।


नरेश  गौतम
जिंदा ही तो रहना है न, तो क्या बुरा है। साथ-साथ रहेंगे। दो नदी, दो पहाड़ों दो फूलों के बीच में ही होंगे हम कहीं। महकते फूल खूब उड़े हैं तुम्हारे बिना। एक खुशबू तुम्हारे बिना उतनी ही खाली है। देखो न, तुम भी बदल गए, लेकिन इन फूलों ने बोलना-बतियाना अभी नहीं छोड़ा है। ये आज भी करते हैं खूब गुफ्तगू।

तुम्हारी देहरी सूखी हुई है न? देखो उस पर चैत ने वसंत उड़ेल कर रख दिया है। रंग बिरंगा हो गया है तुम्हारा घर आंगन। क्या मुझे अब भी फिर से भीतर आने की इजाजत नहीं। एक बार आने दो, आने वाले हर चैत तुम्हारे पूरे घर में फ्यूंलड़ी मनाऊंगी और उस घर को मुक्त कर दूंगी घर के एहसास से। वो हमारा एक जंगल होगा एक बड़ा सा झरना बहेगा वहां। उस पहाड़ी झरने की शीतलता की तुम्हें भी तो खूब जरूरत होगी? उस घर का विस्तार हम पूरी दुनिया तक कर देंगे। उस पूरी दुनिया में सिर्फ हम नहीं होंगे।


जानती हूं इस दुनिया में सिर्फ फूल नहीं होते। और भी होता है बहुत कुछ। उस बहुत कुछ में शामिल है भीषण गर्मी और आग उगलता सूरत का एक गोला। पर क्या फूलों की जरूरत तब भी होती, जब ये गोला ना होता। ये तपती दुनिया इतना बेचैन न करती। और बहुत कुछ चलता चला जाता बहुत ही आसानी से। मैं जानती हूं सब कुछ है और ओढ लेती हूं फूलों की चादर मैं। मैं इससे मुंह नहीं चुराती। मैं आती हूं तुम्हारी दुनिया को ढकने इनसे। लड़ाइयां हमेशा हथियारों की नहीं होती। लोहा सुरक्षा नहीं देता बल्कि वार करता है। उस फूल को मैं उस लोहे में उगा लेना चाहती हूं पर क्यों पता नहीं। शायद डर है इसका एक फूल का। उस फूल भरे सपने में मैं चाहती हूं एक बेहतर दुनिया।


उस बेहतर दुनिया में इनकी जरूरत है और तुम्हारी भी। उस प्रेम भरे सपने में तुम लौट आना बिल्कुल करीब और सोचना वह बहुत कुछ जो छूटकर चला जाएगा। पर मेरा एक सपना है। एक दुनिया है जहां बहुत कुछ जिंदा रखा है सांस लेते फूलों में। इन फूलों में कितना कुछ देखा है। कितना कुछ देखा है उन आंखों में भी, इन्हीं फूलों से गुजरता वह सपना। सपने को लांघती आंखें जब भी विस्तार पाएंगी। तो मुझे पक्का यकीन है उन सपनों से इसकी खुशबू कभी जाएगी नहीं।



उन सपनों को भी आखिरकर एक अस्तित्व पाना है। उसके लिए क्या ये जरूरी नहीं कि तुम तुम हौले से एक फूल पकड़ लेना हाथों में उसकी टहनियों, जड़ों, पत्तों और मिट्टी सहित। धीरे-धीरे एक दुनिया बनने लगेगी फिर से उस खत्म होती दुनिया में। फूलों के लिए कहा जाता है शरमाते हैं लड़कियों की तरह। नहीं, वे प्रेम करते हैं तुम्हारी तरह, तुम भी तो एक फूल ही थे। जो हमेशा प्रेम करना जानते रहे।

आओ तुम्हें याद दिलाऊं क्या होता है प्रेम होना, फूल होना है, जिंदगी होना। तुम्हारे जज्बातों को एक बार फिर से इन्हीं अनगिनत फूलों में लिपटना सिखाना चाहती हूं। चाहती हूं जिंदा हो उठें फिर से वो जज्बात जो कभी इन ही फूलों में लिपटे रह गए थे। और सिकुड़ गए थे। उन्हीं को एक बार फिर से विस्तार दें। आओं ना सपनों का होना बहुत कुछ होना है। फूल के हर हिस्से में लिपटे दुनिया को विस्तार देना है।